Wednesday, September 29, 2021

Major breeds of goats in India

 भारत में बकरियों की प्रमुख नस्लें


बकरी की विभिन्न नस्लों को उनके मुख्य उत्पाद जैसे मांस, दूध, रेशे, खाल आदि के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। भारत बकरी आनुवंशिक संसाधनों का एक समृद्ध भंडार है, जिसमें 34 मान्यता प्राप्त बकरी की नस्लें हैं। परन्तु देश में अवैज्ञानिक व क्रॉसब्रीडिंग के कारण बकरियों की अधिकतर जनसंख्या अवर्णित हैं। भारतीय नस्लों में जमुनापारी, बरबरी व सिरोही दूध व मांस उत्पादन में बेहतर मानी जाती है, उसी तरह बोझा ढोने में भारत की गद्दी व चांगथागी नस्ले अच्छी मानी जाती हैं। भारत की भौगोलिक परिस्थितियों तथा जलवायु के अनुसार बकरी की नस्लों के वर्गीकरण हेतु देश को चार प्रमुख भौगोलिक इलाकों में बांटा गया है, उत्तरी ठंडा क्षेत्र, उत्तर-पश्चिमी शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र।


1. उत्तरी ठंडा क्षेत्र

इस क्षेत्र में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड का पर्वतीय इलाका आता है। इन ठन्डे इलाको में बकरियां पश्मीना रेशे एवं मांस के उत्पादन के लिए पाली जाती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में  जहां यातायात के लिए मोटर मार्ग नहीं है वहां गद्दी तथा चांगथागी नस्ल की बकरियां बोझा ढोने के काम में भी ली जाती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध
रहती है, इसलिए इस क्षे त्र में बकरियों को अलग से कोई ख़ास राशन नहीं दिया जाता है। इस क्षेत्र की बकरियों की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं।

गददी (Gaddi): गद्दी नस्ल की बकरियां हिमाचल प्रदेश के चंबा ,कांगड़ा, कुल्लू घाटी, शिमला, तथा जम्मू कश्मीर के जम्मू के आसपास के इलाको में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम गद्दी जनजाति के लोगों की वजह से पड़ा क्योंकि इस क्षेत्र के गद्दी जनजाति के गडरिया वर्ग के लोग इससे ज्यादा पालते हैं। वैज्ञानिक मौसन ने इस “वाइट हिमालय” का भी नाम दिया है। इस नस्ल को मांस, रेशे के लिए पाला जाता है तथा नर बोझा ढोने के काम भी आते हैं। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 3.60 लाख गद्दी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। इस नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की होती हैं नर का औसत वजन 28 किलोग्राम तथा मादा का औसत वजन 23 किलोग्राम होता है। इस नस्ल की बकरियों का रंग मुख्य रूप से सफेद होता है, हालांकि कुछ काले और भूरे रंग के मिश्रण भी पायी जाती हैं, तथा पूरा शरीर लंबे बालों से ढका रहता है। सींग लम्बे तथा ऊपर और पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। कान 12 सेंटीमीटर तक लम्बे और नीचे की और लटके रहते हैं। इस बकरी के बाल रस्सी तथा कंबल बनाने के काम आते हैं। एक बकरी से एक दुग्धकाल में औसतन 50 किलोग्राम दूध देती है। गद्दी बकरियां से मांस उत्पादन भी अच्छा होता है।

चांगथांगी (Chang Thangi): चांगथांगी नस्ल की बकरियां जम्मू कश्मीर के कारगिल, लेह लद्दाख तथा हिमालय कि लाहुल वह स्पीती घाटियों के इलाको में पाई जाती है। इनको कश्मीरी या पश्मीना बकरियों के नाम से भी जाना जाता है। इनका नाम लद्दाख के चांगथाग इलाके के नाम पर पड़ा जहां ये बहुतायत में पायी जाती हैं। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 2 लाख चांगथांगी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। इस नस्ल की बकरियां बहुत ठन्डे तापमान में यहां तक की -40 डिग्री C तापमान पर भी रह जाती हैं। चांगथागी बकरियों से मुलायम उच्च कोटि का रेशा पश्मीना प्राप्त होता है जिसकी बाज़ार में काफ़ी अच्छी कीमत मिल जाती है। इस नस्ल को पश्मीना तथा मांस के लिए पाला जाता है तथा नर बोझा ढोने के काम भी आते हैं। इस नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की होती हैं और नर तथा मादा का औसत वजन 21 किलोग्राम होता है। इस नस्ल की बकरियों का रंग मुख्य रूप से सफेद होता है, हालांकि कुछ काले और भूरे रंग के मिश्रण भी पायी जाती हैं, तथा पूरा शरीर लंबे बालों से ढका रहता है। सींग ऊपर की ओर उठे हुए बाहर की ओर से घुमावदार होते हैं यह आधी गोलाई में लंबे तथा बाहर की ओर निकले रहते हैं। हर वर्ष एक बकरी से 150 से 215 ग्राम तक पशमीना प्राप्त होता है।

चेगू (Chegu): चेगू नस्ल की बकरियां हिमाचल की लाहुल वह स्पीती घाटियों, किन्नौर और चंबा के इलाको में पाई जाती है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 36 हज़ार चेगू नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। प्रायः इन का रंग सफेद होता है परन्तु सफ़ेद के साथ भूरा लाल भी हो सकता है। सींग ऊपर की ओर उठे हुए तथा घुमावदार होते हैं। इनके नर का औसत वजन 39 किलोग्राम तथा मादा का 25 किलोग्राम वजन होता है। हालांकि इन बकरियों से भी मुलायम रेशा पश्मीना प्राप्त होता है लेकिन इनको मुख्य रूप से मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है। साल में एक बकरी से 100 -120 ग्राम पश्मीना मिल जाता है। चांगथांगीे की तरह चेंगू की रेशा व मांस के लिए पाली जाती है साथ में थोड़ा दूध उत्पादन भी होता हैं, ये बकरियां एक दुग्धकाल में 60-70 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

2. उत्तर-पश्चिमी शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्र

इस क्षेत्र के मुख्य प्रदेशों में राजस्थान,पंजाब,हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश ,मध्य प्रदेश तथा गुजरात के शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्र आते हैं। इस क्षेत्र में खेती के लिए जमीन कम या वर्षा कम होती है। इस क्षेत्र के शुष्क व अर्थ शुष्क क्षेत्रों में ऐसी झाड़ियां चारा वृक्ष तथा घास पाई जाती है जो बकरियों के लिए काफी उपयोगी होती है। यह क्षेत्र बकरियों के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस इलाके में बकरियों की सबसे ज्यादा नस्लें पाई जाती है। इस क्षेत्र की बकरियों की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं।

सिरोही (Sirohi): सिरोही नस्ल की बकरियां राजस्थान के राजसामंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, भीलवाड़ा और अजमेर जिले में पाई जाती है। इनका नाम राजस्थान के सिरोही जिले के नाम पर पड़ा। राजस्थान के ज्यादातर गुर्जर पशुपालक इस नस्ल को ज्यादा पालते हैं। सिरोही बकरियां राजस्थान की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को सहने के अनुकूल है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 18 लाख सिरोही नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 42 किलोग्राम तथा मादा का 35 किलोग्राम वजन होता है। इनका रंग भूरा होता है तथा कुछ बकरियों के शरीर पर हलके या गाड़े भूरे या सफेद धब्बे पाए जाते हैं जो इस नस्ल को एक पहचान देती है। इस नस्ल के कान लम्बे और पत्ते की तरह चपटे और नीचे की ओर लटके रहते हैं, सींग छोटे घुमावदार ऊपर की ओर बढ़े हुए होते हैं। इस नस्ल के गले में लटकते हुए तथा एक मांसल भाग कलंगी होता है जो इस नस्ल की एक खास पहचान है। सिरोही नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 80 किलोग्राम तक दूध देती हैं।


मारवाडी (Marwadi): मारवाड़ी नस्ल की बकरियां राजस्थान के पाली, नागौर, जोधपुर, जालौर, जैसलमेर, बीकानेर तथा बाड़मेर के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल को बाड़मेरी के नाम से जाना जाता है। इस नस्ल का नाम राजस्थान के मारवाड़ इलाके के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। मारवाड़ी नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की तथा शरीर लंबे काले बालों से ढका रहता है। इनका रंग गहरा काला होता है, कान चपटे, मध्यम आकार के तथा नीचे की ओर मुड़े रहते हैं, नर बकरे के सींग छोटे नुकीले तथा पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 39 किलोग्राम तथा मादा का 31 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 53 लाख मारवाड़ी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। मारवाड़ी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 85 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

जखराना (Jakhrana): जखराना नस्ल की बकरियां राजस्थान के अलवर जिले के इलाकों में पाई जाती है।  इस नस्ल का नाम राजस्थान के अलवर जिले के जखराना गाँव के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। जखराना नस्ल की बकरियां आकार में बड़ी तथा काले रंग की होती हैं। उनके मुँह पर तथा कानो पर सफेद रंग के धब्बे पाए जाते हैं, कान चपटे व मध्यम आकार के होते हैं, सिर संकरा वह उठा हुआ होता है। सींग मध्यम नुकीले तथा ऊपर से पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 58 किलोग्राम तथा मादा का 45 किलोग्राम वजन होता है।  वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 9 लाख जखराना नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। जखराना नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 152 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

बीटल (Beetal): बीटल नस्ल की बकरियां पंजाब के गुरदासपुर, अमृतसर और फिरोजाबाद के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम पंजाब के गुरदासपुर जिले की बटाला तहसील के नाम पर पड़ा है। बीटल नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की होती है इनके शरीर का रंग भूरा है या सफेद धब्बेदार होता है, कान लंबे तथा नीचे की ओर लटके होते हुए होते हैं, बकरे के सींग छोटे ओर मुड़े हुए होते हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 57 किलोग्राम तथा मादा का 45 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 3.70 लाख बीटल नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। बीटल नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है, इस नस्ल का दुग्ध उत्पादन काफी अच्छा मन जाता है, एक दुग्धकाल में 150-200 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

बारबरी (Barbari): बारबरीनस्ल की बकरियां राजस्थान के भरतपुर तथा उत्तर प्रदेश के हाथरस, इटावा, एटा, आगरा, मथुरा और अलीगढ के इलाकों में पाई जाती है। ऐसी मान्यता है की इस नस्ल की उत्पत्ति पूर्वी अफ्रीका के सोमालिया के बरबेरिया में हुई थी इसलिए इसका नाम बारबरी पड़ा।बारबरी यह आकार में मध्य में भूरे सफेद तथा कत्थई धब्बो के साथ सफेद रंग की होती हैं। इनके कान छोटे नुकीले तथा ऊपर की ओर उठे हुए होते हैं इनके सिंग मध्यम आकार के तथा पीछे की ओर मुड़े होते हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 36 किलोग्राम तथा मादा का 20 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 20 लाख बारबरी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। बारबरी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 80-100 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

जमुनापारी (Jamunapari): जमुनापारी नस्ल की बकरियां उत्तर प्रदेश के इटावा के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम यमुना नदी के नाम पर पड़ा जिसके आसपास इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। जमुनापारी एक बड़े आकार की बकरी है इसका रंग सफेद होता है। कुछ बकरियों के गले में सिर पर धब्बे होते हैं, इन बकरियों के नाक उभरी हुई होती है तथा बालों के गुच्छे होते हैं जिसे रोमननोज कहते हैं। इनके कान 30 सेंटीमीटर तक लंबे तथा लटके रहते हैं। सींग छोटे व तलवार की तरह चपटे होते हैं और पीछे की ओर मुड़े होते हैं। पिछले पैरों पर लंबे बाल होते हैं। इन बकरियों का उदर विकसित तथा थन काफी लंबे भारी होते हैं। इनका शरीर बड़ा होता है तथा नर का औसत वजन 45 किलोग्राम तथा मादा का 38 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 16 लाख जमुनापारी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। जमुनापारी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 200 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

मेहसाणा (Mehsana): मेहसाणा नस्ल की बकरियां गुजरात के मेहसाणा, पाटन, साबरकांठा, बनासकांठा, गांधीनगर और अहमदाबाद के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम गुजरात के मेहसाणा जिले के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है।  यह मध्यम आकार की होती है, इनका रंग भूरा काला होता है तथा कान के आधार के पास सफेद धब्बे पाए जाते हैं। कान सफेद पत्तो की तरह तथा नीचे की ओर गिरे रहते हैं। कानों की पूरी सफेदी पर काले धब्बे होते हैं। सिंग नुकीले तथा हल्के ऊपर की ओर मुड़े रहते हैं, नाक उभरी हुई होती है, जिसे रोमननोज कहते हैं, शरीर पर लगभग 10 सेंटीमीटर लंबे बाल होते हैं। नर का औसत वजन 37 किलोग्राम तथा मादा का 32 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 5 लाख मेहसाणा नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। मेहसाणा नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 200-300 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

सुरती (Surti):  सुरती नस्ल की बकरियां गुजरात के नवसारी, नर्मदा, सूरत, वलसाद, भरूच, वड़ोदरा के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम गुजरात सूरत जिले के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। सुरती नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की नस्ल है जिसे ज्यादातर शहरी इलाकों में पाला जाता है क्योंकि यह ज्यादा लंबी दूरी तक नहीं चल सकती है, इसके शरीर का रंग सफेद होता है, सींग छोटे में नीचे मुड़े होते हैं। नर का औसत वजन 29 किलोग्राम तथा मादा का 31 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 2.5 लाख सुरती नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। सुरती नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से दूध के लिए पाली जाती है, अयन काफी विकसित होता है तथा थन कीपाकार होते हैं। एक दुग्धकाल में 300 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

कच्छी (Katchi): कच्छी नस्ल की बकरियां गुजरात के पाटन, कच्छ, मेहसाना और  बनासकांठा के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम गुजरात के कच्छ इलाके के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है।  इनका रंग काला व गले, मुहं और कानो पर सफेद धब्बे पाए जाते हैं। नाक उभरी हुई होती है, कान लंबे वह नीचे लटके रहते हैं।सींग मोटे नुकीले घुमावदार तथा ऊपर की ओर उठे रहते हैं। नर का औसत वजन 47 किलोग्राम तथा मादा का 40 किलोग्राम वजन होता है।  वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 3.8 लाख कच्छी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। कच्छी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 100-140 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

गोहिलवाड़ी (Gohilwadi): गोहिलवाड़ी नस्ल की बकरियां गुजरात के पोरबंदर, राजकोट, जूनागढ़, भावनगर और अमरेली के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम गुजरात के गोहिलवाड़ इलाके के नाम पर पड़ा जो की काठियावाड़ के अंतर्गत आता है।  शरीर का रंग मुख्यता काला होता है। बाल मोटे और लंबे होते हैं कान गोलाई आकार के नीचे की ओर लटके रहते हैं। उनके सींग मोटे हल्के मुड़े रहते हैं। नर का औसत वजन 52 किलोग्राम तथा मादा का 42 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 1.6 लाख गोहिलवाड़ी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। गोहिलवाड़ी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 200-240 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

झालावाड़ी (Zalawadi): झालावाड़ी नस्ल की बकरियां गुजरात के सुरेंद्रनगर और राजकोट के इलाकों में पाई जाती है, इसके अतिरिक्त मेहसाना, अहमदाबाद और भावनगर के कुछ इलाकों में भी पायी जाती है। इस नस्ल का नाम गुजरात के झालावाड़ इलाके के नाम पर पड़ा जो जो की काठियावाड़ के अंतर्गत आता है और अब सुरेंद्रनगर के नाम से जाना जाता है। यह मध्यम आकार की है काले लंबे मोटे बाल वाली नस्लें है। इनके कान लंबे पती के आकार में खुले हुए होते हैं इनके सींग छोटे सीधे स्क्रू की तरह तथा ऊपर की ओर उठे रहते हैं। अयन अच्छी तरह से विकसित होते हैं। नर का औसत वजन 38 किलोग्राम तथा मादा का 33 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 3.9 लाख झालावाड़ी नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। झालावाड़ी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 250-290 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

3. दक्षिणी क्षेत्र

इस इलाके में केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्य आते हैं। यह क्षेत्र मध्य प्रायद्वीप में अर्ध-शुष्क है और तट के साथ गर्म और आर्द्र है। इस इलाके में पाई जाने वाली बकरियों की सभी नस्लें अच्छी मांस देने वाली होती हैं। इस क्षेत्र की बकरियों की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं।

संगमनेरी (Sangamneri): संगमनेरी  नस्ल की बकरियां महाराष्ट्र के पुणे, अहमदनगर और नासिक के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के संगमनेर इलाके के नाम पर पड़ा है। यह मध्यम आकार की होती है। इनका रंग मुख्य रूप से सफ़ेद होता है परन्तु सफेद के साथ काला व भूरे का मिश्रण भी कई बार पाया जाता है। बाल छोटे व खुरदरे होते हैं। इनके कान मध्यम आकार के नीचे की और लटके रहते हैं। सींग ऊपर व पीछे की ओर मुड़े रहते हैं। नर का औसत वजन 39  किलोग्राम तथा मादा का 32 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 1.6 लाख संगमनेरी  नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। संगमनेरी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 70 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

मालाबारी (Malabari): मालाबारी  नस्ल की बकरियां केरल के कालीकट, गन्नौर, मालपुरा और वायनाड के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम केरल के मालाबार इलाके के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। मुख्य रंग सफ़ेद होता है पर काला और सफेद के मिश्रण में भी पाया जाता है। नर के मुंह के नीचे दाड़ी नुमा बालों का गुच्छा लटका रहता है। सींग छोटे से पीछे की ओर मुड़े होते हैं, कान मध्यम आकार है, तथा पूरी तरह नीचे लटके हुए नहीं होते हैं। नर का औसत वजन 39 किलोग्राम तथा मादा का 31 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 5.6 लाख मालाबारी  नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। मालाबारी  नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 43 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

उस्मानाबादी (Usmanabadi): उस्मानाबादी  नस्ल की बकरियां महाराष्ट्र के उस्मानाबाद, सोलापुर, और अहमदनगर के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम महाराष्ट्र के उस्मानाबाद इलाके के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। ऊंचाई में दूसरे नस्लों से अपेक्षाकृत ऊंची होती है। तथा रंग काला होता है कभी-कभी काले और सफेद में भूरे धब्बे भी पाए जाते हैं। कान मध्यम लंबाई के होते हैं। इनके बकरों में सींग पाए जाते हैं।लेकिन बकरियों को 50% संख्या में सींग नहीं होते हैं। नर का औसत वजन 34 किलोग्राम तथा मादा का 32 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 24.8 लाख उस्मानाबादी  नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। उस्मानाबादी नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस तथा दूध के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 40-70 किलोग्राम तक दूध देती हैं।

कनीआड़ू (kanni Adu): कनीआड़ू नस्ल की बकरियां तमिलनाडु प्रदेश के तुथुकुंडी,  विरुधुनगर व त्रिनेवल्ली के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम इसके मुहं के दोनों और सफ़ेद रंग की पट्टी की वजह से पड़ा। यह ऊंचे कद की होती हैं, इसका रंग काला होता है तथा मुहं के दोनों और सफेद रंग की पट्टी होती है। कुछ बकरियों में गले के दोनों तरफ सफ़ेद रंग के धब्बे भी पाए जाते हैं। कान मध्यम आकार के होते हैं। सींग पीछे और बहार की ओर मुड़े होते हैं। इस नस्ल के बकरे मध्यम आकार (15-25cm) के सींग होते हैं और बकरियों में छोटे आकार (<15cm) के होते हैं। नर का औसत वजन 34 किलोग्राम तथा मादा का 28 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 6.9 लाख कनीआड़ू नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। कनीआड़ू नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस के लिए पाली जाती हैं।

4. पूर्वोत्तर क्षेत्र

इस इलाके में बिहार, पश्चिम बंगाल ,उड़ीसा, असम और देश के अन्य उत्तर-पूर्वी राज्य आते हैं। इस इलाके में नमी ज्यादा रहती है। यह पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्सों को छोड़कर ज्यादातर गर्म और नम इलाके है, जो उप-शीतोष्ण और आर्द्र हैं। इस इलाके में बकरियों की ज्यादा नस्लें नहीं है, इस क्षेत्र की बकरियों की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं।

गंजाम (Ganjam): गंजाम नस्ल की बकरियां उड़ीसा के समुद्री तट वाले दक्षिणी जिलों नयागढ़, खुर्दा, गजपति, रायागडा व गंजाम के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल की उत्पत्ति गोला जनजाति के लोगो ने की, इस नस्ल का नाम उड़ीसा के गंजाम इलाके के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। इसका रंग काला या भूरा होता है परन्तु कई बकरियां काले भूरे धब्बेदार भी पाई जाती है। कान मध्यम आकार के तथा सींग लंबे व ऊपर की ओर उठकर नीचे की ओर मुड़े होते हैं। नर का औसत वजन 35 किलोग्राम तथा मादा का 29 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 3 लाख गंजाम नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। गंजाम नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस के लिए पाली जाती है और एक दुग्धकाल में 65 किलोग्राम तक दूध भी देती हैं।

ब्लैक बंगाल (Black bengal): ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां पश्चिमी बंगाल में पाई जाती है परन्तु पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, ओड़िसा था पूर्वी राज्यों जैसे आसाम त्रिपुरा आदि राज्यों में भी पाई जाती है। इस नस्ल का नाम पश्चिमी बंगाल के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। ऊंचाई में यह छोटे कद की होती है, इसका रंग काला होता है पर कभी कभी सफ़ेद, और हल्का लाल रंग भी पाया जाता है। बकरे बकरी दोनों में सींग पाए जाते हैं, सींग छोटे होते हैं और उपर या पीछे की तरफ मुड़े होते हैं। साल से डेढ़ साल की उम्र में पहली बार ब्याह जाती है और साल में दो बार बच्चे देती है। नर का औसत वजन 32 किलोग्राम तथा मादा का 20 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 1 करोड़ 74 लाख ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस के लिए पाली जाती है तथा एक दुग्धकाल में 100-140 किलोग्राम तक दूध भी देती हैं।

आसाम हिल्स (Assam hills): आसाम हिल्स नस्ल की बकरियां आसाम और मेघालय के इलाकों में पाई जाती है। इस नस्ल का नाम आसाम के नाम पर पड़ा जो इस नस्ल का मुख्य क्षेत्र है। इनका रंग मुख्य रूप से सफ़ेद होता है परन्तु कभी कभी काले धब्बे भी पाए जाते हैं। पैर छोटे होते हैं, तथा शरीर लंबा होता है। सींग छोटे, सीधे तथा नुकीले होते हैं। साल से डेढ़ साल की उम्र में पहली बार ब्याह जाती है और साल में दो बार बच्चे देती है। नर का औसत वजन 20 किलोग्राम तथा मादा का 18 किलोग्राम वजन होता है। वर्ष 2013 की पशुगणना के अनुसार लगभग 11 लाख आसाम हिल्स नस्ल की बकरियां भारत में मौजूद हैं। आसाम हिल्स नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से मांस के लिए पाली जाती है एक दुग्धकाल में 10 किलोग्राम तक दूध भी देती हैं।

Haryana's black gold: Murrah buffalo

 हरियाणा का काला सोना : मुर्राह भैंस

 मुर्राह नस्ल विश्व की सबसे अधिक दुग्धोत्पादन करने वाली भैंस है जिसको हरियाणा राज्य का गौरव कहा जाता है। उच्च विक्रय दाम होने के कारण मुर्राह भैंस को हरियाणा का काला सोना कहते हैं। दिल्ली के आसपास होने के कारण इसे दिल्ली नस्ल भी कहते हैं। इस नस्ल के झोटों को भारी बोझा ढोने के कार्य में उपयोग करने के कारण इसे एशिया का ट्रैक्टर भी कहते हैं। रोहतक, जींद एवं हिसार जिलों में उच्च दुग्धोत्पादन करने वाली मुर्राह भैंसों की संख्या है जिनको निर्यात किया जाता है। मुर्राह भैंसों की एक ऐसी नस्ल है जिसका विश्व में सबसे ज्यादा फैलाव हुआ है। राष्ट्रीय पशु आनुवंशिकी संसाधन ब्यूरो करनाल द्वारा मुर्राह नस्ल की भैंस को INDIA_BUFFALO_ 0500_MURRAH_01001 नम्बर से पंजीकृत किया गया है।



गृह स्थान (Home tract)
       मुर्राह भैंस का जन्म स्थान हरियाणा का रोहतक, जींद, हिसार है। यह नस्ल पंजाब में नाभा, पटियाला एवं दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में भी पाली जाती है। इसके अलावा राजस्थान, गुजरात व उत्तर प्रदेश में मुर्राह भैंस पाली जाती है। अच्छा दुग्धोत्पादन होने के कारण मुर्राह भैंस सारे भारत में फैल गई है जिसको या तो शुद्ध आनुवंशिकता के आधार पर पाला जाता है या फिर कम दुग्धोत्पादन करने वाली देशी नस्लों के उन्नयन (Grading up) के लिए उपयोग किया जाता है।

शारीरिक विशेषताएं

  1. शरीर का आकार (Body shape, size) : शरीर भारी व गठीला, शरीर की त्वचा अपेक्षाकृत चिकनी व मुलायम तथा अन्य भैंसों की अपेक्षा शरीर पर कम बाल, मादा पशुओं का शरीर आगे से पतला और पीछे भारी तथा चौड़ा (तिकोना)। पीठ चौड़ी तथा छोटी जो सामने की ओर ढालू और पतली होती है। शरीर की चमड़ी मुलायम होती है जिस पर अपेक्षृता कम बाल होते हैं।
  2. रंग (Body colour) : मुर्राह भैंस के शरीर एवं बालों का रंग गहरा काला होता है। पूँछ के बाल नीचे से सफेद या काला होता है। चेहरे एवं टांगों पर सफेद रंग के धब्बे हो सकते हैं जिनको आमतौर पर पसन्द नहीं किया जाता है।
  3. जीभ (Tongue) : मुर्राह नस्ल की भैंसों की जीभ का रंग काला होता है।
  4. सिर (Head) : मुर्राह भैंसों का सिर अपेक्षाकृत छोटा एवं हल्का होता है।
  5. माथा (Forehead) : मुर्राह भैंसों का सिर अपेक्षाकृत छोटा होता है।
  6. सींग (Horns) : मुर्राह नस्ल की भैंसों के सींग अन्य नस्ल की भैंसों से अलग छोटे एवं खुण्डेहोते हैं। सींग सिर के पीछे से ऊपर की ओर ऊठ कर कुंडलित हो कर अन्दर की ओर मुड़ जाते हैं, जिनको सामान्य बोलचाल की भाषा में खुण्डे सींग कहते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है तो सींगों में खुलापन आने के साथ-साथ उनका कुंडल भी बढ़ता जाता है।
  7. चेहरा (Face) : मुर्राह भैंसों का सिर अपेक्षाकृत लम्बा होता है।
  8. थूथन (Muzzle) : थुथन का रंग काला होता है।
  9. आँखें (Eyes) : आँखों व पलकों का रंग काला होता है। आँखों में सफेद रंग होना शुद्ध नस्ल की मुर्राह नहीं माना जाता है।
  10. कान (Ears) : कान आमतौर पर क्षैतिजिय (Horizontal) होते हैं।
  11. गर्दन (Neck) : हल्की लेकिन अपेक्षाकृत लम्बी होती है।
  12. गलकम्बल (Dewlap) : नहीं होता है।
  13. नाभि–सूत्र (Naval flap) : आमतौर पर मुर्राह भैंसों में नाभि-सूत्र नहीं होता यदि होता है तो ना के बराबर ही होता है।
  14. टांगे (Limbs) : पैर छोटे लेकिन मजबूत होते हैं।
  15. खुर (Hooves) : मुर्रा नस्ल के खुर चौड़े वाले काले या कम गहरे काले होते हैं।
  16. कंधे का कूबड़ (Shoulder hump) : मुर्राह भैंसों में कंधे पर कूबड़ नहीं होता है लेकिन यह भाग थोड़ा उभरा हुआ होता है।
  17. पूँछ (Tail) : पूँछ घुटनों (Fetlock joint) तक लम्बी व पूँछ के नीचे के काले या सफेद होते हैं लेकिन 8.0 ईंच से ज्यादा सफेद नहीं होने चाहिए।
  18. लेवटी व थन (Udder and teats) : अयन पूर्ण रूप से विकसित, जिस पर टेड़ी-मेड़ी दुग्ध सिराएं होती है। अयन आगे और पीछे की ओर दोनों तरफ फैला हुआ होता है। थन दूरी पर होते हैं। आगे के थनों की अपेक्षा पीछे के थन के लम्बे होते हैं।
शारीरिक नापतोल

  • शारीरिक भार (Body weight) : मुर्राह नस्ल की भैंसों का औसत भार 450 किलोग्राम जबकि झोटे का 550 किलोग्राम होता है।
  • शारीरिक ऊँचाई (Body height) : मुर्रा नस्ल की भैंस की औसत ऊँचाई (Withers height) 132 सेंटीमीटर जबकि झोटे की 142 सेंटीमीटर होती है।
  • शारीरिक लम्बाई (Body length) : भैंस की औसत लम्बाई 3 जबकि झोटे की 149.8 सेंटीमीटर होती है।
  • हृदय परिधि (Heart girth) : मुर्राह नस्ल की भैंसों में औसत हृदय परिधि 4 एवं झोटे की 220.7 सेंटीमीटर होती है।

प्रजनन गुण
      पालन-पोषक की परिस्थितियों के अनुसार प्रथम ब्यांत की उम्र, गाँवों में 45 से 50 महीने एवं अच्छे फार्मों पर 36 से 40 महीने होती है। ब्यांत अन्तराल अवधि 450 से 500 दिन होती है।

दुग्ध उत्पादन (Milk production)
 मुर्राह नस्ल की भैंसें आमतौर पर 10–12 किलोग्राम प्रति दिन दुग्धोत्पादन करती हैं लेकिन 1970 – 71 में भारत सरकार द्वारा आयोजित अखिल भारतीय दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता में एक चैंपियन मुर्राह भैंस से एक दिन में 31.5 किलोग्राम दुग्धोत्पादन का रिकॉर्ड किया गया है। भारत से बुलगारिया को निर्यात की गई मुर्राह भैंसों का दुग्धोत्पादन 12 किलोग्राम प्रति दिन दर्ज किया गया है जबकि भारत में ऐसी बहुत सी मुर्राह भैंसें जिनका प्रति दिन का दुग्धोत्पादन 20 किलोग्राम से भी ज्यादा है।

विशेष (Remarks)
नर ज्यादा शक्तिशाली होते है जिनका उपयोग भार ढोने में किया जाता है। हरियाणा मुर्राह नस्ल के झोटों का उपयोग स्थानीय एवं अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर कम दुग्धोत्पादन करने वाली देशी भैंसों के उन्नयन (Grading up) के लिए किया जाता है।

वर्तमान स्थिति
मुर्राह नस्ल की भैंस सबसे अच्छी दुधारू भैंस है, जिसके झोटों का उपयोग नस्ल सुधार के लिए किया जाता है। इसकी दुग्धोत्पादन की क्षमता एवं निम्न स्तर की देशी भैंसों का दुग्धोत्पादन बढ़ाने के लिए हरियाणा सरकार ने नकद प्रोत्साहन राशि वितरण के लिए योजना चला रखी हैं। पशुधन गणना के अनुसार मुर्राह भैंसों की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है। मुर्राह भैंस के झोटों का उपयोग थाईलैंड, इण्डोनेशिया, फिलीपींस, मेडागास्कर एवं ब्राजील इत्यादि में निम्न स्तर की भैंसों के उन्नयन के लिए उपयोग किया जाता है।


Reproductive revolution using classified semen / sex determined semen / sex semen in milch animals and its use

 दुधारू पशुओं में वर्गीकृत वीर्य / लिंग निर्धारित वीर्य/ सेक्स सीमेन एवं उसके उपयोग से प्रजनन क्रांति

पशुधन के विकास में कृत्रिम गर्भाधान विधि को सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी के रूप में स्वीकार किया गया है तथा प्रदेश में इस तकनीकी का व्यापक उपयोग सफलतापूर्वक किया जा रहा है। गो वंशीय अनुपयोगी नर वतसों व छुट्टा पशुओं की समस्या के समाधान हेतु आज के परिवेश में कृत्रिम गर्भाधान में वर्गीकृत वीर्य का उपयोग एक विकल्प के रूप में उपलब्ध है। विगत वर्षों में देश के विभिन्न भागों में वर्गीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान करा कर गो वंशीय मादा संततियों को उत्पन्न किया जा रहा है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना अंतर्गत कृत्रिम गर्भाधान में वर्गीकृत वीर्य मुख्य रूप से साहीवाल एच एफ एवं जर्सी के उपयोग से 90% गोवंशीय, स्वदेशी, विदेशी एवं वर्णसंकर मादा संतति उत्पन्न हो रही है जिन से भविष्य में दुग्ध उत्पादन में आशातीत वृद्धि होने की संभावना है।

 

वर्गीकृत वीर्य क्या है

पशुपालकों की इच्छा के अनुरूप संतति प्राप्ति हेतु कृत्रिम गर्भाधान में उपयोग किए जाने वाले वीर्य को सेक्सड सीमेन कहा जाता है। प्रायः कृत्रिम गर्भाधान में सामान्य वीर्य के उपयोग से 50% नर तथा 50% मादा संतति उत्पन्न होती है परंतु वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से 90% मादा तथा 10% नर संतति उत्पन्न होती हैं।


वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से लाभ

1.      90% मादा संतति की प्राप्ति।

2.      अनुपयोगी नर बच्चों की संख्या में कमी करना।

3.      त्वरित आनुवंशिक उन्नयन

4.      तेजी से पशु समूहों में बढ़ोतरी।

5.      सरल तरीके से संतति का उत्पन्न होना।

6.      पशुपालक की आमदनी में वृद्धि।

7.      अधिक दुग्ध उत्पादन।

 

वर्गीकृत वीर्य के उपयोग, का आर्थिक पहलू

1.      अधिक मूल्य की संतति का उत्पादन

2.      च्च गुणवत्ता युक्त संतति का अधिक उत्पादन

3.      गर्भधारण दर में कमी

4.      वीर्य स्ट्रास का मूल्य अधिक होना।

 

वर्गीकृत वीर्य के उपयोग पर ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य

वर्गीकृत वीर्य स्ट्राज का मूल्य अधिक होने तथा गर्भधारण दर कम होने के कारण कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं को अधिकतम गर्भधारण हेतु निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है: –

1.      चयनित पशु के जननांग पूर्ण रूप से विकसित एवं स्वस्थ होने चाहिए।

2.      वर्गीकृत वीर्य का प्रयोग बछियों में वरीयता के आधार पर करें।

3.      चयनित पशु स्वस्थ एवं प्रजाति के अनुरूप दुग्ध उत्पादक हो।

4.      चयनित पशु की मद चक्र अवस्था नियमित होनी चाहिए।

5.      चयनित पशु में पूर्व में जननांग संबंधी कोई रोग नहीं होना चाहिए।

6.      वर्गीकृत वीर्य का उपयोग केवल कुशल एवं अनुभवी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता से ही कराएं।

7.      वर्गीकृत वीर्य की थॉइंग, एवं उपयोग में विशेष सावधानी बरतें।

8.      वर्गीकृत वीर्य स्ट्रास को तरल नत्रजन पात्र में समुचित ढंग से रखरखाव करें।

9.      चयनित पशु को 1 महीने पूर्व पेट के कीड़ों की औषधि देना सुनिश्चित करें।

10. चयनित पशु को 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर प्रतिदिन दें।

 

गोवंशीय, मादा पशु का चयन

1.      पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा पशु के चयन पर पशु की प्रजाति के अनुसार उम्र एवं शारीरिक वजन पर भी ध्यान दिया जाना है।

2.      चयनित पशु स्वस्थ एवं प्रजाति के अनुरूप दूध उत्पादक हो।

3.      बछियों में गायों की तुलना में गर्भधारण दर अधिक होती है इसलिए इस कार्यक्रम में बछियों का चयन मां की दुग्ध उत्पादकता के आधार पर किया जाएगा, परंतु प्रथम ऋतु काल मैं गर्भाधान नहीं किया जाएगा तथा पशुपालकों को द्वितीय ऋतु काल में कृत्रिम गर्भाधान कराने हेतु प्रेरित किया जाएगा। वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज की थॉइंग के उपरांत, शीघ्र अति शीघ्र 5 से 7 मिनट के अंदर साफ एवं सूखी कृत्रिम गर्भाधान गन के माध्यम से ऋतुमय, पशु के गर्भाशय में डालें। वीर्य स्ट्रोज कनिष्तर को , तरल नत्रजन युक्त बायो लॉजिकल कंटेनर्स के मुख से नीचे गर्दन तक उठाएं तथा 30 सेकंड से अधिक समय तक ना रखें।

4.      चयनित पशु के पालन पोषण हेतु हरे चारे के अतिरिक्त संतुलित आहार एवं क्रमी नाशक औषधि कृत्रिम गर्भाधान से 1 माह पूर्व देना चाहिए।

5.      कार्यक्रम में छोटे पशुपालक, प्रगतिशील पशुपालक एवं गौशालाओं के पशु सम्मिलित होंगे।

6.      चयनित पशुओं की टैगिंग, फोटोग्राफी, अनुश्रवण एवं मादा संतति की टैगिंग एवं अभिलेखीकरण किया जाना सम्मिलित है।

7.      चयनित पशु की यूआईडी टैग से टैगिंग किया आना अनिवार्य होगा यदि चयनित पशु की पूर्व में यूआईडी टैग से टैगिंग की गई हो तो ऐसी स्थिति में केवल फोटोग्राफी एवं अभिलेखीकरण किया जाएगा।

8.      वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज का उपयोग केवल ऋतुमय अवस्था( मध्य अवस्था से अंतिम अवस्था के मध्य) के पशुओं में ही करें।

 

वर्गीकृत वीर्य के उपयोग की सीमाएं

1.      वर्गीकृत वीर्य/ लिंग निर्धारित वीर्य स्ट्रोज मैं  शुक्राणुओं की संख्या कम अर्थात 2 मिलियन होने के कारण गर्भधारण दर में कमी होना जबकि सामान्य वीर्य स्ट्रॉस में शुक्राणुओं की संख्या 20 से 25 मिलियन होती है।

2.      वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज की कीमत का अधिक होना। उत्तर प्रदेश में साहिवाल के उच्च गुणवत्ता युक्त सांड के वर्गीकृत वीर्य स्ट्रा की  कीमत ₹300 प्रति  कृत्रिम गर्भाधान परंतु बुंदेलखंड क्षेत्र के जनपदों में पशु पालकों से 100 रुपए प्रति , कृत्रिम गर्भाधान शुल्क जमा कराना होगा। परंतु एच एफ के वर्गीकृत वीर्य स्ट्रो की कीमत 1298 रुपए तथा ₹30 कृत्रिम गर्भाधान शुल्क अलग से लिया जाता है।

 

उत्पन्न संततियों का रखरखाव

1.      उत्पन्न संतति की गर्भनाल को नए ब्लेड  से काटे और एंटीसेप्टिक दवा जैसे बीटाडीन लगाएं ताकि नवजात में किसी भी तरह के संक्रमण को रोका जा सके।

2.      संतति को उसकी मां के पास छोड़ देना चाहिए जिससे उसकी मां चाट सके तथा नवजात बच्चा धीरे धीरे खड़ा हो सके।

3.      जब नवजात खड़ा हो जाए तब उसे मां का पहला गाढ़ा पीला दूध अर्थात खीस या, कोलोस्ट्रम बच्चे के शरीर भार का 10% पिलाना चाहिए जो बच्चे को विभिन्न रोगों से बचाव के साथ-साथ विकास में भी सहायक होगा।

4.      ब्याई गाय का दूध 5 दिन के उपरांत सामान्य अवस्था में आ जाने पर बच्चे के शरीर भार का 15% दूध 1 माह तक पिलाना चाहिए उसके पश्चात 3 माह तक शारीरिक भार का 10% तक दूध पिलाना चाहिए। बच्चा पैदा होने से 3 माह तक की आयु का समय बच्चे की बढ़वार का उपयुक्त समय है तथा इस अवधि में आहार एवं कृमि नाशक दवा पान आदि का विशेष ध्यान रखें ताकि बच्चे का शारीरिक विकास पूर्ण रूप से हो सके तथा मादा संतति निश्चित अवधि पर गर्मी में आ सके।

5.      नवजात बच्चे को 1 सप्ताह के अंदर पशु चिकित्सा अधिकारी की सलाह से पेट के कीड़े की दवा अवश्य पिलाएं उसके पश्चात बच्चे को प्रतिमाह पेट के कीड़े की दवा छह माह की आयु तक पिलाएं तथा छह माह की आयु के उपरांत पेट के कीड़े की दवा 3 माह के अंतराल पर खिलाएं।

6.      नवजात बच्चे के शरीर पर वाहय परजीवी होने की दशा में पशु चिकित्सा अधिकारी की सलाह से परजीवी नाशक दवा का प्रयोग करें।

7.      नवजात बच्चों का 4 माह की आयु तक अधिक सर्दी एवं गर्मी से बचाव किया जाना चाहिए ताकि खुले में जाने से नवजात बीमार ना हो सके तथा मृत्यु की संभावना कम से कम हो सके।

8.      उत्पन्न संतति की टैगिंग यूआईडी टैग द्वारा अनिवार्य रूप से किया जाना होगाl

 

निष्कर्ष

पशु वैज्ञानिकों द्वारा दुधारू पशुओं की आनुवंशिक क्षमता का कृत्रिम गर्भाधान (वंशावली चयन, प्रोजेनी टेस्टिंग, क्रास ब्रीडिंग एवं आणविक तकनीकी के मार्कर चयन से उत्पन्न सांड)

द्वारा अधिकतम दुग्ध उत्पादन हेतु कार्य किया गया है। देश की बढ़ती आबादी एवं नैसर्गिक संसाधनों के दृष्टिगत अधिक दूध की आपूर्ति हेतु शोधकर्ताओं एवं प्रजनकों द्वारा अधिकतम दुग्ध उत्पादन करना ही एकमात्र विकल्प है जिसके लिए अधिक से अधिक गुणवत्ता युक्त मादा संततियों की आवश्यकता है। कृत्रिम गर्भाधान में वर्गीकृत वीर्य का उपयोग हमारे देश के लिए दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा।

Sirohi Breed of Goat (सिरोही)

 

सिरोही बकरी मुख्य रूप से पश्चिमी भारत में स्थित राजस्थान के सिरोही जिले में पाई जाने वाली मध्यम आकार की नस्ल है। इसके अतिरिक्त सिरोही बकरी अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक और जयपुर जिलों में भी पाई जाती है। सिरोही बकरियां गुजरात राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों में भी उपलब्ध हैं।



सिरोही बकरियों का रंग हल्के या गहरे भूरे रंग के धब्बो के साथ मुख्य रूप से भूरा होता है। अवसर पर, कोट रंग में पूरी तरह से सफेद हो सकता है। सिरोही बकरियों की नाक छोट और उभरी होती है। कान लम्बे और लटकते रहते है। पूंछ मुड़ी हुई होती है।  इसके शरीर के बाल मोटे  एवं छोटे होटे है।

सिरोही बकरी दोहरे उद्देश्य वाली बकरियां  हैं, जो दूध और मांस दोनों के लिए पाली जाती हैं। सिरोही बकरियां में बीमारियों के प्रति अधिक  प्रतिरोधक क्षमता होती हैं। साथ ही और कठिन जलवायु परिस्थितियों को सहने की अधिक क्षमता होती है।

हालांकि सिरोही बकरियों के मुख्य प्रजनन क्षेत्र राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में स्थित हैं, फिर भी वे कई अन्य भारतीय राज्यों में भी पायी जाती है। बकरी प्रतिदिन 0. 75-1 लीटर तक दूध देती है।


Breeding Information in Dogs

 श्वानो में प्रजनन संबंधी जानकारियाँ

आज कल के समय में श्वान पालन काफी लोकप्रिय हुआ है जिसके साथ ही श्वान प्रजनन केंद्र भी एक व्यवसाय के तौर पर उभर कर आए है। ऐसे में श्वानों से जुड़ी प्रजनन संबंधी जानकारियाँ श्वान पालकों व श्वान प्रजनन केंद्र व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित होंगी। सामान्यतः श्वान 8-12 माह की आयु मे यौवनावस्था को प्राप्त करते  है। मादा श्वानों का मदचक्र व मदकाल अन्य पशुओं की तुलना में अधिक लंबी अवधी का होता है जो यौवनावस्था प्राप्त करते ही प्रारंभ हो जाता है। मदचक्र प्रजनन अंगों के समन्वय से निश्चित अंतराल मे चलने वाली चक्रीय अवस्था हे, मादा श्वान सामान्यतः वर्ष में एक बार मदकाल दर्शाती है तथा कुछ मादा श्वानों की नस्ल वर्ष में दो बार मदकाल दर्शाती है। मदकाल वह समय है जब मादा नर के साथ प्रजनन के लिया तैयार होती है। इनके मदचक्र में मुख्यतः चार चरण होते है, मद चक्र के चार चरण निम्न प्रकार हे :

1.   प्रोइस्टर्स:- यह अवस्था 9 दिनों की होती हे इसका प्रमुख लक्षण योनि से रक्त स्त्राव का होना है, क्योंकि इस चरण मे प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की उपलब्धता मे कमी होती हे जिसके कारण रक्त स्त्राव होता है। नर श्वान मादा श्वान की ओर आकर्षित होते है, परंतु मादा श्वान प्रजनन के लिया तैयार नहीं होती।

2.    इस्टर्स:- ये चरण भी 9 दिनों  का  होता हे इस चरण मे मादा श्वान नर श्वान के साथ प्रजनन के लिए तैयार होती हे। इसी चरण के प्रथम दो दिवसों मे अंडोत्सर्जन की प्रक्रिया होती हे।

3.   मेटइस्टर्स /डाइस्टर्स:- ये चरण लगभग 60 दिनों का होता है इसमे मादा श्वान किसी प्रकार की प्रजनन प्रक्रिया नहीं दर्शाती हे। इस चरण मे प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की अधिकता होती है।

4.    एनइस्टर्स:- ये चरण लगभग 90-150 दिनों का होता हे इसमे मादा श्वान की प्रजनन प्रक्रिया निष्क्रिय होती हे। प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की उपलब्धता अधिक होती है ।




     मद काल के लक्षण एवं जाँच

मदकाल मे आने के पूर्व 9 दिन तक रक्त स्त्राव दर्शाती हे। योनि मे सूजन तथा गीलापन होता हे। मद चक्र के चरणों की जाँच वैजाइनल साइटोलॉजी विधि द्वारा की जा सकती हे। इसमें योनि से स्वेब द्वारा नमूने लेकर प्रयोगशाला मे स्टेनिंग कर उपस्थित कोशिकाओ की गाणना कर मद चक्र के चरणों का पता लगाया जाता है। मद काल के समय लगभग 80% तक कोर्नीफाइड कोशिकाए उपस्थित होती है।

     प्रजनन प्रबंधन

मादा श्वान के मदकाल दर्शाने के प्रथम दो दिवसों के अंदर अंडोत्सर्जन की प्रक्रिया होती हे अतः रक्त स्त्राव बन्द हो जाने के पश्चात प्रथम दिन मादा श्वान को नर  श्वान से संयोग करवाना चहीए तथा एक दिन के अंतराल पर तीन से चार बार संयोग करवाना चाहिए व लॉकिंग की प्रक्रिया का होना सुनिश्चित करना चाहिए।

गर्भावस्था की जाँच

मादा श्वानों का गर्भकाल लगभग 60 दिनों का होता हे। इनमे गर्भावस्था की जाँच अल्ट्सोनोग्राफी विधि की सहायता से प्रजनन क्रिया के 30 दिनों के पश्चात की जा सकती है। अल्ट्सोनोग्राफी परीक्षण के पूर्व मादा श्वान को उचित मात्रा में पानी पिलाना चाहिए जिससे उचित परीक्षण करने में सहायता मिलती है। रेडियोलॉजी (एक्स-रे) विधि से 45 दिनों की गर्भावस्था की जाँच की जा सकती है।



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