भारत में बकरियों की प्रमुख नस्लें
1. उत्तरी ठंडा क्षेत्र
रहती है, इसलिए इस क्षे त्र में बकरियों को अलग से कोई ख़ास राशन नहीं दिया जाता है। इस क्षेत्र की बकरियों की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं।
427- Opp. Sancheti Cancer Hospital, Pal Link Road, Jodhpur (Raj.)-342008
पशुधन के विकास में कृत्रिम गर्भाधान विधि को सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी
के रूप में स्वीकार किया गया है तथा प्रदेश में इस तकनीकी का व्यापक उपयोग
सफलतापूर्वक किया जा रहा है। गो वंशीय अनुपयोगी नर वतसों व छुट्टा पशुओं की समस्या
के समाधान हेतु आज के परिवेश में कृत्रिम गर्भाधान में वर्गीकृत वीर्य का उपयोग एक
विकल्प के रूप में उपलब्ध है। विगत वर्षों में देश के विभिन्न भागों में वर्गीकृत
वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान करा कर गो वंशीय मादा संततियों को उत्पन्न किया जा रहा
है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना अंतर्गत कृत्रिम गर्भाधान में वर्गीकृत वीर्य
मुख्य रूप से साहीवाल एच एफ एवं जर्सी के उपयोग से 90% गोवंशीय, स्वदेशी, विदेशी एवं वर्णसंकर मादा संतति उत्पन्न हो
रही है जिन से भविष्य में दुग्ध उत्पादन में आशातीत वृद्धि होने की संभावना है।
वर्गीकृत वीर्य क्या है?
पशुपालकों की इच्छा के अनुरूप संतति प्राप्ति हेतु कृत्रिम गर्भाधान
में उपयोग किए जाने वाले वीर्य को सेक्सड सीमेन कहा जाता है। प्रायः कृत्रिम
गर्भाधान में सामान्य वीर्य के उपयोग से 50% नर तथा 50% मादा संतति
उत्पन्न होती है परंतु वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से 90% मादा
तथा 10% नर संतति उत्पन्न होती हैं।
वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से लाभ
1. 90% मादा संतति की प्राप्ति।
2. अनुपयोगी नर बच्चों की संख्या में कमी करना।
3. त्वरित आनुवंशिक उन्नयन
4. तेजी से पशु समूहों में बढ़ोतरी।
5. सरल तरीके से संतति का उत्पन्न होना।
6. पशुपालक की आमदनी में वृद्धि।
7. अधिक दुग्ध उत्पादन।
वर्गीकृत वीर्य के उपयोग, का आर्थिक पहलू
1. अधिक मूल्य की संतति का उत्पादन
2. च्च गुणवत्ता युक्त संतति का अधिक उत्पादन
3. गर्भधारण दर में कमी
4. वीर्य स्ट्रास का मूल्य अधिक होना।
वर्गीकृत वीर्य के उपयोग पर
ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य
वर्गीकृत वीर्य स्ट्राज का मूल्य अधिक होने तथा गर्भधारण दर कम होने
के कारण कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं को अधिकतम गर्भधारण हेतु निम्नलिखित
बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है: –
1. चयनित पशु के जननांग पूर्ण रूप से विकसित एवं
स्वस्थ होने चाहिए।
2. वर्गीकृत वीर्य का प्रयोग बछियों में वरीयता के
आधार पर करें।
3. चयनित पशु स्वस्थ एवं प्रजाति के अनुरूप दुग्ध
उत्पादक हो।
4. चयनित पशु की मद चक्र अवस्था नियमित होनी चाहिए।
5. चयनित पशु में पूर्व में जननांग संबंधी कोई रोग
नहीं होना चाहिए।
6. वर्गीकृत वीर्य का उपयोग केवल कुशल एवं अनुभवी
कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता से ही कराएं।
7. वर्गीकृत वीर्य की थॉइंग, एवं उपयोग में विशेष सावधानी
बरतें।
8. वर्गीकृत वीर्य स्ट्रास को तरल नत्रजन पात्र में
समुचित ढंग से रखरखाव करें।
9. चयनित पशु को 1 महीने पूर्व पेट के कीड़ों की औषधि देना सुनिश्चित
करें।
10. चयनित पशु को 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर प्रतिदिन दें।
गोवंशीय, मादा पशु का चयन
1. पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा पशु के चयन पर पशु की
प्रजाति के अनुसार उम्र एवं शारीरिक वजन पर भी ध्यान दिया जाना है।
2. चयनित पशु स्वस्थ एवं प्रजाति के अनुरूप दूध
उत्पादक हो।
3. बछियों में गायों की तुलना में गर्भधारण दर अधिक
होती है इसलिए इस कार्यक्रम में बछियों का चयन मां की दुग्ध उत्पादकता के आधार पर
किया जाएगा, परंतु
प्रथम ऋतु काल मैं गर्भाधान नहीं किया जाएगा तथा पशुपालकों को द्वितीय ऋतु काल में
कृत्रिम गर्भाधान कराने हेतु प्रेरित किया जाएगा। वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज की थॉइंग
के उपरांत, शीघ्र अति शीघ्र 5 से 7
मिनट के अंदर साफ एवं सूखी कृत्रिम गर्भाधान गन के माध्यम से ऋतुमय,
पशु के गर्भाशय में डालें। वीर्य स्ट्रोज कनिष्तर को , तरल नत्रजन युक्त बायो लॉजिकल कंटेनर्स के मुख से नीचे गर्दन तक उठाएं तथा
30 सेकंड से अधिक समय तक ना रखें।
4. चयनित पशु के पालन पोषण हेतु हरे चारे के अतिरिक्त
संतुलित आहार एवं क्रमी नाशक औषधि कृत्रिम गर्भाधान से 1 माह पूर्व देना चाहिए।
5. कार्यक्रम में छोटे पशुपालक, प्रगतिशील पशुपालक एवं गौशालाओं
के पशु सम्मिलित होंगे।
6. चयनित पशुओं की टैगिंग, फोटोग्राफी, अनुश्रवण एवं मादा संतति की टैगिंग एवं अभिलेखीकरण किया जाना सम्मिलित है।
7. चयनित पशु की यूआईडी टैग से टैगिंग किया आना
अनिवार्य होगा यदि चयनित पशु की पूर्व में यूआईडी टैग से टैगिंग की गई हो तो ऐसी
स्थिति में केवल फोटोग्राफी एवं अभिलेखीकरण किया जाएगा।
8. वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज का उपयोग केवल ऋतुमय
अवस्था( मध्य अवस्था से अंतिम अवस्था के मध्य) के पशुओं में ही करें।
वर्गीकृत वीर्य के उपयोग की
सीमाएं
1. वर्गीकृत वीर्य/ लिंग निर्धारित वीर्य स्ट्रोज मैं शुक्राणुओं की संख्या कम
अर्थात 2 मिलियन होने के कारण गर्भधारण दर में कमी होना जबकि
सामान्य वीर्य स्ट्रॉस में शुक्राणुओं की संख्या 20 से 25
मिलियन होती है।
2. वर्गीकृत वीर्य स्ट्रोज की कीमत का अधिक होना।
उत्तर प्रदेश में साहिवाल के उच्च गुणवत्ता युक्त सांड के वर्गीकृत वीर्य स्ट्रा
की कीमत
₹300 प्रति कृत्रिम गर्भाधान
परंतु बुंदेलखंड क्षेत्र के जनपदों में पशु पालकों से 100 रुपए
प्रति , कृत्रिम गर्भाधान शुल्क जमा कराना होगा। परंतु एच एफ
के वर्गीकृत वीर्य स्ट्रो की कीमत 1298 रुपए तथा ₹30 कृत्रिम गर्भाधान शुल्क अलग से लिया जाता है।
उत्पन्न संततियों का रखरखाव
1. उत्पन्न संतति की गर्भनाल को नए ब्लेड से काटे और एंटीसेप्टिक दवा
जैसे बीटाडीन लगाएं ताकि नवजात में किसी भी तरह के संक्रमण को रोका जा सके।
2. संतति को उसकी मां के पास छोड़ देना चाहिए जिससे
उसकी मां चाट सके तथा नवजात बच्चा धीरे धीरे खड़ा हो सके।
3. जब नवजात खड़ा हो जाए तब उसे मां का पहला गाढ़ा
पीला दूध अर्थात खीस या, कोलोस्ट्रम
बच्चे के शरीर भार का 10% पिलाना चाहिए जो बच्चे को विभिन्न
रोगों से बचाव के साथ-साथ विकास में भी सहायक होगा।
4. ब्याई गाय का दूध 5 दिन के उपरांत सामान्य अवस्था में आ जाने पर बच्चे
के शरीर भार का 15% दूध 1 माह तक
पिलाना चाहिए उसके पश्चात 3 माह तक शारीरिक भार का 10%
तक दूध पिलाना चाहिए। बच्चा पैदा होने से 3 माह
तक की आयु का समय बच्चे की बढ़वार का उपयुक्त समय है तथा इस अवधि में आहार एवं
कृमि नाशक दवा पान आदि का विशेष ध्यान रखें ताकि बच्चे का शारीरिक विकास पूर्ण रूप
से हो सके तथा मादा संतति निश्चित अवधि पर गर्मी में आ सके।
5. नवजात बच्चे को 1 सप्ताह के अंदर पशु चिकित्सा अधिकारी की सलाह से पेट
के कीड़े की दवा अवश्य पिलाएं उसके पश्चात बच्चे को प्रतिमाह पेट के कीड़े की दवा
छह माह की आयु तक पिलाएं तथा छह माह की आयु के उपरांत पेट के कीड़े की दवा 3
माह के अंतराल पर खिलाएं।
6. नवजात बच्चे के शरीर पर वाहय परजीवी होने की दशा
में पशु चिकित्सा अधिकारी की सलाह से परजीवी नाशक दवा का प्रयोग करें।
7. नवजात बच्चों का 4 माह की आयु तक अधिक सर्दी एवं गर्मी से बचाव किया
जाना चाहिए ताकि खुले में जाने से नवजात बीमार ना हो सके तथा मृत्यु की संभावना कम
से कम हो सके।
8. उत्पन्न संतति की टैगिंग यूआईडी टैग द्वारा
अनिवार्य रूप से किया जाना होगाl
निष्कर्ष
पशु वैज्ञानिकों द्वारा दुधारू पशुओं की आनुवंशिक क्षमता का कृत्रिम
गर्भाधान (वंशावली चयन, प्रोजेनी टेस्टिंग, क्रास
ब्रीडिंग एवं आणविक तकनीकी के मार्कर चयन से उत्पन्न सांड)
द्वारा अधिकतम दुग्ध उत्पादन हेतु कार्य किया गया है। देश की बढ़ती
आबादी एवं नैसर्गिक संसाधनों के दृष्टिगत अधिक दूध की आपूर्ति हेतु शोधकर्ताओं एवं
प्रजनकों द्वारा अधिकतम दुग्ध उत्पादन करना ही एकमात्र विकल्प है जिसके लिए अधिक
से अधिक गुणवत्ता युक्त मादा संततियों की आवश्यकता है। कृत्रिम गर्भाधान में
वर्गीकृत वीर्य का उपयोग हमारे देश के लिए दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में मील का
पत्थर साबित होगा।
सिरोही बकरी मुख्य रूप से पश्चिमी भारत
में स्थित राजस्थान के सिरोही जिले में पाई जाने वाली मध्यम आकार की नस्ल है। इसके
अतिरिक्त सिरोही बकरी अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक और जयपुर जिलों में भी पाई जाती है। सिरोही बकरियां गुजरात राजस्थान
और उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों में भी उपलब्ध हैं।
सिरोही बकरियों
का रंग हल्के या गहरे भूरे रंग के धब्बो के साथ मुख्य रूप से भूरा होता है। अवसर
पर, कोट रंग में पूरी तरह से सफेद हो
सकता है। सिरोही बकरियों की नाक छोट और उभरी होती है।
कान लम्बे और लटकते रहते है। पूंछ मुड़ी हुई होती है। इसके
शरीर के बाल मोटे एवं छोटे होटे है।
सिरोही बकरी
दोहरे उद्देश्य वाली बकरियां हैं, जो दूध और मांस दोनों के लिए पाली जाती हैं।
सिरोही बकरियां में बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधक
क्षमता होती हैं। साथ ही और कठिन जलवायु परिस्थितियों को सहने की अधिक क्षमता होती
है।
हालांकि सिरोही
बकरियों के मुख्य प्रजनन क्षेत्र राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में स्थित हैं, फिर भी वे कई अन्य भारतीय राज्यों
में भी पायी जाती है। बकरी प्रतिदिन 0. 75-1 लीटर तक दूध
देती है।
आज कल के समय में श्वान पालन काफी लोकप्रिय हुआ है जिसके साथ ही
श्वान प्रजनन केंद्र भी एक व्यवसाय के तौर पर उभर कर आए है। ऐसे में श्वानों से
जुड़ी प्रजनन संबंधी जानकारियाँ श्वान पालकों व श्वान प्रजनन केंद्र व्यवसाय से
जुड़े लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित होंगी। सामान्यतः श्वान 8-12 माह की आयु मे यौवनावस्था को
प्राप्त करते है। मादा श्वानों का मदचक्र व मदकाल अन्य पशुओं की तुलना में
अधिक लंबी अवधी का होता है जो यौवनावस्था प्राप्त करते ही प्रारंभ हो जाता है।
मदचक्र प्रजनन अंगों के समन्वय से निश्चित अंतराल मे चलने वाली चक्रीय अवस्था हे,
मादा श्वान सामान्यतः वर्ष में एक बार मदकाल दर्शाती है तथा कुछ
मादा श्वानों की नस्ल वर्ष में दो बार मदकाल दर्शाती है। मदकाल वह समय है जब मादा
नर के साथ प्रजनन के लिया तैयार होती है। इनके मदचक्र में मुख्यतः चार चरण होते है,
मद चक्र के चार चरण निम्न प्रकार हे :
1. प्रोइस्टर्स:-
यह अवस्था 9 दिनों की होती हे इसका प्रमुख
लक्षण योनि से रक्त स्त्राव का होना है, क्योंकि इस चरण मे
प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की उपलब्धता मे कमी होती हे जिसके कारण रक्त स्त्राव होता
है। नर श्वान मादा श्वान की ओर आकर्षित होते है, परंतु मादा
श्वान प्रजनन के लिया तैयार नहीं होती।
2. इस्टर्स:- ये चरण
भी 9 दिनों का होता हे इस चरण मे मादा श्वान नर श्वान के साथ प्रजनन के लिए तैयार होती
हे। इसी चरण के प्रथम दो दिवसों मे अंडोत्सर्जन की प्रक्रिया होती हे।
3. मेटइस्टर्स /डाइस्टर्स:- ये चरण लगभग 60 दिनों का होता
है इसमे मादा श्वान किसी प्रकार की प्रजनन प्रक्रिया नहीं दर्शाती हे। इस चरण मे
प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की अधिकता होती है।
4. एनइस्टर्स:- ये चरण लगभग 90-150 दिनों का होता हे इसमे मादा श्वान की प्रजनन प्रक्रिया निष्क्रिय होती हे। प्रोजेस्टरोंन हॉर्मोन की उपलब्धता अधिक होती है ।
मद काल के लक्षण एवं जाँच
मदकाल मे आने के पूर्व 9 दिन तक रक्त स्त्राव दर्शाती हे।
योनि मे सूजन तथा गीलापन होता हे। मद चक्र के चरणों की जाँच वैजाइनल साइटोलॉजी
विधि द्वारा की जा सकती हे। इसमें योनि से स्वेब द्वारा नमूने लेकर प्रयोगशाला मे
स्टेनिंग कर उपस्थित कोशिकाओ की गाणना कर मद चक्र के चरणों का पता लगाया जाता है।
मद काल के समय लगभग 80% तक कोर्नीफाइड कोशिकाए उपस्थित होती
है।
मादा श्वान के मदकाल दर्शाने के प्रथम दो दिवसों के अंदर अंडोत्सर्जन
की प्रक्रिया होती हे अतः रक्त स्त्राव बन्द हो जाने के पश्चात प्रथम दिन मादा
श्वान को नर श्वान से संयोग करवाना चहीए तथा एक दिन के अंतराल पर तीन से चार
बार संयोग करवाना चाहिए व लॉकिंग की प्रक्रिया का होना सुनिश्चित करना चाहिए।
मादा श्वानों का गर्भकाल लगभग 60 दिनों का होता हे। इनमे गर्भावस्था की जाँच
अल्ट्सोनोग्राफी विधि की सहायता से प्रजनन क्रिया के 30 दिनों
के पश्चात की जा सकती है। अल्ट्सोनोग्राफी परीक्षण के पूर्व मादा श्वान को उचित
मात्रा में पानी पिलाना चाहिए जिससे उचित परीक्षण करने में सहायता मिलती है।
रेडियोलॉजी (एक्स-रे) विधि से 45 दिनों की गर्भावस्था की
जाँच की जा सकती है।