Friday, October 15, 2021

कृत्रिम गर्भाधान के नये आयाम



 कृत्रिम गर्भाधान में कृत्रिम विधि से नर पशु से वीर्य एकत्रित करके मादा पशु की प्रजनन नली में रखा जाता है। सबसे पहले 1937 में पैलेस डेयरी फॅार्म मैसूर में यह किया गया था, आज पूरे देश में पशुओं में यह प्रजनन विधि अपनायी जा रही है। चुने हुए अच्छी नस्ल के सांड़ सेे कृत्रिम विधि से वीर्य इकट्ठा किया जाता है। इसके लिए सांड़ों को प्रशिक्षित किया जाता है जिससे कि वे दूसरे अन्य पशुओं (डमी) पर चढ़कर कृत्रिम योनि में वीर्य छोड़ देते हैं। इस वीर्य का फिर परीक्षण किया जाता है जिससे वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं की मात्रा एवं गतिशीलता का पता चलता है, साथ ही अगर सांड़ को कोई ऐसी बीमारी है जो वीर्य द्वारा मादा में संक्रमण करे, ये भी पता लगा लिया जाता है। उसके बाद इस वीर्य को कुछ माध्यमों द्वारा संरक्षित कर लिया जाता है। पहले इस वीर्य को द्रव अवस्था में ही संरक्षित किया जाता था परन्तु आजकल इसका संरक्षण हिमीकृत तरल नाइट्रोजन में किया जाता है जिससे इसकी गुणवत्ता में कमी न आये साथ ही साथ लम्बे समय तक उसको रखा जा सके और कहीं भी आसानी से ले जाया जा सके। इसके बाद जब मादा पशु गरम हो जाती है तब एक प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा सही समय पर इस हिमीकृत वीर्य को पुनः साधारण तापमान पर लाकर मादा पशु के गर्भाशय में पहुँचाया जाता है।


यहां हमारे पशु पालकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि पशु जब गर्मी में आता है तब लक्षणों को ध्यान से देखकर पहचानें। आजकल विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि इस कृत्रिम गर्भाधान विधि का उपयोग और भी तरह से होता है। जब सांड़ से वीर्य लेकर प्रयोगशाला में चेक किया जाता है उसी समय अच्छी प्रयोगशालाओं में वीर्य से बछड़ा पैदा करने वाले शुक्राणुओं को अलग कर दिया जाता है जिससे कृत्रिम गर्भाधान द्वारा केवल बछिया ही पैदा होगी। इस विज्ञान की तरक्की का फायदा हमारे पशुपालक भी आने वाले समय में उठा सकते हैं। कृत्रिम गर्भाधान द्वारा हम नस्ल सुधार भी कर सकते हैं। हम अपने कम उत्पादक पशुओं को ज्यादा उत्पादन वाले सांड़ों के वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान करवाकर अपने पशुओं की नस्लों को सुधार सकते हैं।


कृत्रिम गर्भाधान विधि को हम भ्रूण प्रत्यारोपण में भी प्रयोग करते हैं। जिसमें अच्छे नर के वीर्य से अच्छी नस्ल की मादा में जिसमें एक बार एक ही माह में कई अण्डे बढ़े हुए हों सबको निषेचित करते हैं, तथा कुछ दिनों बाद उस मादा के गर्भाशय से सारे भू्रणों को निकालकर अनुत्पादक गायों के गर्भाशयों में एक-एक कर डालकर बछड़े/बछिया को 9 माह तक बड़ा होने के लिए रख देते हैं। परन्तु इस पूरी समयावधि में असली मां खाली रहती है। और उससे पूरे समय दूध लिया जा सकता है, साथ ही साथ अच्छी नस्ल के कई बच्चे एक साथ उत्पन्न किये जा सकते हैं।

कृत्रिम गर्भाधान के फायदे

  1. सामान्य गर्भाधान में एक वर्ष में एक सांड से 50-60 गायों को ही गाभिन किया जा सकता है। सामान्य गर्भाधान की अपेक्षा जल्दी एवं बड़ी संख्या में पशुओं को गाभिन किया जा सकता है। एक सांड़ के वीर्य से एक वर्ष में हजारों गायों को गाभिन किया जा सकता है।
  2. धन व श्रम दोनों की बचत होती है।
  3. अगर किसी कारण से अच्छी नस्ल का सांड़ बूढ़ा या विकलांग हो गया है तो भी उसका उपयोग कृत्रिम गर्भाधान में किया जा सकता है। पशुपालक को सांड़ पालने की आवश्यकता भी नहीं होती।
  4. गर्भाधान के समय मादा में फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचा जा सकता है। इस विधि से पशु प्रजनन का रिकार्ड रखना भी आसान हो जाता है।

पशुओं में फास्फोरस की कमी से होने वाला पाईका रोग



 पशुओं द्वारा ऐसी अखाद्य वस्तुओं को खाना जिन्हें आहार नहीं कहा जा सकता है की स्थिति को पाइका कहते हैं। पाइका के कई प्रकार होते हैं:

  1. कोप्रोॉफेजिया: स्वयं या अन्य पशु का गोबर खाना।
  2. ओस्टियोफेजिया: मृत पशुओं की हड्डियां चाटना या चबाना।
  3. जियोफेजिया: मिट्टी खाना।
  4. इन्फेंटोफेजिया: मादा बच्चा देने के बाद स्वयं के नवजात बच्चों को खाना।
  5. पिटोफेजिया: पशु स्वयं या अन्य पशु के बाल या चमड़ी को चाटना।
  6. चाटने की बीमारी: कागज, कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी, पत्थर आदि खाना।
  7. लोहे व अन्य धातु की चीजों को चाटना या चबाना।
  8. स्टेबल वॉइसेज: घोड़े द्वारा अस्तबल में अस्तबल की दीवारों को चाटना।
  • गाय और भैंस कपड़ा, चमड़ा, गोबर, मल मिट्टी व कागज खाती हैं।
  • घोड़े धूल,रेत, लकड़ी तथा हड्डी चाटते या चबाते अथवा खाते हैं।
  • कुत्ते गोबर, मल, कपड़ा, घास, खिलौना, जूते, कागज आदि खाते हैं।

कारण
बहुधा यह रोग कैल्शियम, फास्फोरस, नमक व अन्य खनिज तत्व तथा विटामिन की कमी के कारण होता है। इसके अलावा पाइका, के यह लक्षण जठरशोथ, अग्न्याशय की बीमारी रेबीज एवं मसूड़ों की सूजन आदि में भी होते हैं। पेट में जब भारी संख्या में विभिन्न तरह के अंत: क्रमि होते हैं। जब पशुओं को एक साथ सकरी जगह पर रखा जाता है तो मिट्टी खाने की संभावना अधिक रहती है।

पशुओं के व्यवहार का अगर हम बारीकी से निरीक्षण करें तो उनकी बहुत सी बीमारियों का पता हम बिना किसी डॉक्टरी जांच के कर सकते हैं। कुछ पशु मिट्टी और दीवाल चाटते हैं एवं दूसरे पशु का पेशाब पीने का प्रयास करते हैं और अखाद्य पदार्थ खाने की कोशिश करते हैं, ऐसा तब होता है जब पशुओं में फॉस्फोरस की कमी हो जाती है तो ये सब लक्षण दिखाई देने लगते हैं।पशु चारा उगाने की जमीन में अगर फॉस्फोरस की कमी हो जाएगी तो उस भूमि में उगी चारा फसलों में भी फॉस्फोरस की कमी हो जाएगी और उन चारा फसलों को खाने वाले पशुओं में भी फॉस्फोरस की कमी हो जाएगी और उपरोक्त सभी लक्षण दिखाई देने लगेंगे। अगर पशु के रातिब मिश्रण में चोकर नहीं मिलाया गया है तो भी फॉस्फोरस की कमी हो सकती है।फॉस्फोरस चूंकि दूध में भी स्रावित होता है इसलिए दुधारू पशुओं के चारे, दाने में उचित मात्रा मैं फॉस्फोरस मौजूद न होने पर भी उन पशुओं में फॉस्फोरस की कमी हो जाती है।चारा फसलों और अनाजों के छिलकों में फॉस्फोरस बहुतायत में पाया जाता है या फिर रातिब मिश्रण में मिलाया जाने वाला मिनरल मिक्सचर इसका अच्छा स्रोत हैlपशुओं में फॉस्फोरस की कमी होने पर पशुओं की भूख कम हो जाएगी, पशु उन सभी चीजों को खाने की कोशिश करेगा जो उसे नहीं खानी चाहिए। वास्तव में वह दीवार चाट कर, मिट्टी खाकर या दूसरे पशुओं का पेशाब चाटकर अपनी फॉस्फोरस की कमी को पूरा करना चाहता है। वृद्धिशील पशुओं की बढ़वार कम हो जाएगी। फॉस्फोरस की कमी होने पर पशु की प्रजनन क्षमता प्रभावित होगी। पशु मद या गर्मी में नहीं आएंगे।पशुओं की हड्डियां कमजोर हो जाएंगी।

पशुओं को फॉस्फोरस की कमी से बचाने के लिए निम्न उपाय करें
चारा फसलें उगाते समय खेत में उचित मात्रा में N:P:K डालिये।पशुओं के लिए रातिब मिश्रण बनाते समय उसमें 30 से 40 प्रतिशत चोकर जरूर रखिए।रातिब मिश्रण बनाते समय उसमें 2 प्रतिशत की दर से उत्तम गुणवत्ता के खनिज लवण का मिक्सचर जरूर मिलाइए।पशुओं को बहुत अधिक मात्रा में कैल्शियम देने पर भी फॉस्फोरस की कमी हो जाती है इसलिए पशुओं को केवल कैल्शियम ही आवश्यकता से अधिक मात्रा में नहीं खिलाते रहना है।पशुओं में अगर ऊपर बताये गए लक्षण दिखाई दें तो पशुओं का निम्नलिखित उपचार कराएं।

उपचार

  1. रोग के प्रमुख कारण का पता लगाकर उसे दूर करें।
  2. पशु को दिए जाने वाले आहार की पौष्टिकता में सुधार लाएं।
  3. रोमनथी पशुओं को, आहार में ईस्ट पाउडर दें।
  4. इंजेक्शन विटामिन ए तथा विटामिन बी कांप्लेक्स भी दें।
  5. गाय भैंस को 50 ग्राम खनिज लवण प्रतिदिन दें।इसके लिए मिनरल ईट को पशु को चाटने के लिए आगे रखें।
  6. वयस्क पशु को आहार में प्रतिदिन लगभग 50 ग्राम सादा नमक अवश्य दें।
  7. प्रत्येक तीन माह पर पशुओं को पेट के कीड़ों की औषधि अवश्य दें।
  8. पशुओं को कम से कम 5 दिन तक पशु चिकित्सक की सलाह से फास्फोरस का इंजेक्शन अवश्य लगवाएं एवं पशुओं
  9. को प्रतिदिन 50 ग्राम सोडाफास पाउडर खाने में दें।
इस लेख में दी गयी जानकारी लेखक के सर्वोत्तम ज्ञान के अनुसार सही, सटीक तथा सत्य है, परन्तु जानकारीयाँ विधि समय-काल परिस्थिति के अनुसार हर जगह भिन्न हो सकती है, तथा यह समय के साथ-साथ बदलती भी रहती है। यह जानकारी पेशेवर पशुचिकित्सक से रोग का निदान, उपचार, पर्चे, या औपचारिक और व्यक्तिगत सलाह के विकल्प के लिए नहीं है। यदि किसी भी पशु में किसी भी तरह की परेशानी या बीमारी के लक्षण प्रदर्शित हो रहे हों, तो पशु को तुरंत एक पेशेवर पशु चिकित्सक द्वारा देखा जाना चाहिए।

मादा पशुओं में प्रसव के पहले होने वाले रोग एवं उससे बचाव

 मादा पशुओं में गर्भकाल के बाद बच्चों को जन्म देना प्रसव कहलाता है। प्रसव के समय मादा पशु का स्वास्थ्य सामान्य होना चाहिए तथा पशु को अधिक मोटा एवं दुर्बल नही होना चाहिए। प्रसव से 2-3 सप्ताह पूर्व पशु को अलग आरामदाक होता है। मादा पशु में प्रसव के प्रथम लक्षण दिखाई देने से बच्चे के जन्म तक मादा पशु की अत्यन्त देख रेख आवश्यक होती है क्योंकि प्रसव काल जीवन का सबसे खतरनाक समय होता है तथा थोडी सी असावधानी मादा पशु तथा बच्चे दोनो के लिए नुकसानदायक हो सकता है। मादा पशुओं मे प्रसव की तीन प्रमुख अवस्थायें होती है-

  1. प्रथम अवस्था: ग्रीवा का पूर्ण रुप से खुलना
  2. द्वितीय अवस्था: भ्रूण का बाहर निकला
  3. तृतीय अवस्था: अपरा का बाहर निकलना तथा गर्भाशय का प्रत्यावर्तन होना


मादा पशुओं में प्रसव के पहले एवं प्रसव के बाद कुछ घातक रोग हो जाते है जिसका समय पर उपचार नहीं करने पर मादा पशु की मृत्य भी हो सकती है मादा पशुओं में प्रसव के पहले तथा बाद में होने वाले रोग निम्नलिखित है-

मादा पशुओं में प्रसव के पहले होने वाले रोग

  1. गर्भपात
  2. प्रसव अवरोध
  3. योनि का बाहर आना

1. गर्भपात

पशुओं में गर्भावस्था के पूर्ण होने से पहले, जीवित अथवा मृत भ्रूण का मादा शरीर से बाहर निकलना गर्भपात कहलाता है। मादा पशुओ में गर्भपात के तीन प्रमुख कारण होते है:

  1. मादा पशुओं को गर्भावस्था के समय लगने वाली चोट या किसी प्रकार का आघात।
  2. पशुओं में होने वाले जीवाणु, विषाणु या परजीवी का संक्रमण।
  3. गर्भावस्था के समय हारमोन का असन्तुलन।

लक्षण

गर्भपात होने की दशा में पशु बेचैन होते हैं तथा ब्याने जैसे लक्षण प्रदर्शित करते हैं। प्रभावित पशु की योनि से तरल पदार्थ निकलने लगता है जो कि दुर्गन्धयुक्त तथा रक्त मिला हुआ हो सकता है। कभी-कभी पीव मिश्रित भी हो सकता है अल्प विकिसित भ्रूण जीवित या मृत्यु की अवस्था में बाहर आ जाता है। सामान्यत जेर अन्दर ही रूक जाती है।

उपचार

  1. मादा पशुओं में गर्भपात होने के बाद यदि जेर अन्दर रह गयी हो उसे बाहर निकलना चाहिए इसके बाद एंटीसेप्टिक औशधियों के घोल से जैसे- सेवलान, बीटाडीन या पोटैशियम परमैगनेट से गर्भाशय की अच्छी तरह से धुलाई करनी चाहिए।
  2. मादा पशुओं के गर्भाशय मे जीवाणुनाशक टिकिया या बोलस जैसे फ्यूरिया, स्टेक्लीन या टेरामाइसीन या आब्लेट-यूरोवेल्क्स डालना चाहिए तथा साथ ही साथ ऐन्टीबायोटिक जैसे डाइक्रिस्टीसीन, ऐम्पीसेलीन, क्लोक्सासीलीन, सेफट्राइक्जोन इत्यादि मे से किसी एक का पूरा कोर्स करना चाहिए।
  3. गर्भपात होने के बाद गर्भाशय में रुके हुऐ पदार्थों को बाहर निकालने के लिए तथा कभी-कभी गर्भपात कराने के लिए प्रोसालवीन या पी0जी0एफ0टू अल्फा की सूई मांस मे लगाना लाभदायक होता है आवश्कता  पड़ने पर 10-12 दिन में दुबारा सूई लगाई जा सकती है।
  4. एक बार गर्भपात हो जाने के बाद बार-बार गर्भपात की समस्या बनी रहती है अतः उचित उपचार के साथ-साथ गर्भपात की रोकथाम के लिए गर्भाधान के बाद से दो महीने तक लेप्टाडीन की 10 गोली रोज दिन मे दो बार देने से लाभ होता है।

2. प्रसव अवरोध

मादा पशुओं में प्रसव के समय भ्रूण के बाहर निकलने मे अवरोध उत्पन्न हो जाता है। मादा पशु के द्वारा उत्याधिक जोर लगाने पर भी भ्रूण बाहर नही निकलता है। इस अवस्था में भ्रूण के सिर, पैर या शरीर का कुछ भाग कभी-कभी दिखाई पड़ता है।  मादा पशुओं में होने वाले प्रसव अवरोध दो प्रकार के होते हैं।

  1. मातृ-आगत प्रसवरोध
  2. भ्रूण-प्रसवरोध

मातृ-आगत प्रसवरोध: इस प्रकार के प्रसवरोध मादा पशु के गर्भाशय इत्यादि में उत्पन्न होने वाली बाधाओं के कारण होता है जो कि निम्न है:

  • हारमोन के असन्तुलन या कमी के कारण गर्भाशय की मांसपेशियों के संकुचन में कमी आ जाती है।
  • मादा पशुओं में खनिज तत्व या कैल्शियम की कमी के कारण गर्भाशय में शिथिलता आ जाती है। अधिक उम्र के मादा पशु में यह लक्षण अधिक पाया जाता है।
  • गर्भाशय का घूम जाना मातृ-आगत प्रसवरोध का कारण बनता है।

संरचनात्मक विकृतियाँ: संरचानात्मक विकृतियाँ जो कि मातृ-आगत प्रसवरोध का कारण बनती हैं, जो कि निम्न हैं:

  • गर्भाशय की ग्रीवा में कड़ापन आ जाता है जिसके फैलने में अवरोध उत्पन्न होता है
  • वस्ती-अस्थियों की बनावट में विकृति के आ जाने पर प्रसवरोध का कारण बनता है। कभी-कभी गर्भाशय योनि मार्ग में आ जाता है जो कि अवरोध का कारण बनता है ।

लक्षण: इससे प्रभवित मादा पशु अत्याधिक बेचैन रहती है। प्रसव के लिए बार बार जोर लगाती है तथा बार बार उठती बैठती रहती है। परन्तु बच्चा देने मे असमर्थ रहती है ।

निदान: मातृ-आगत प्रसवरोध का सही कारण जानने के लिए हाथ को अच्छी तरह साफ करके कीटाणुरहित कर लेना चाहिए। इसके बाद हाथ को चिकना कर योनि तथा गर्भाशय में डालकर सही स्थिति का पता लगाना चाहिए।

उपचार: इस अवस्था में प्रभावित मादा पशु के सही कारण के अनुसार उपचार करना चाहिए। हारमोन्स की कमी के कारण उपजी शिथिलता को दूर करने के लिए एपीडोसिन की 10-12 मिलीलीटर मात्रा देनें से लाभ मिलता है ।

संरचानात्मक विकृतियों द्वारा उत्पन्न अवरोधो में चिकनाई तथा ब्यानें के लिए रस्सी आदि का उपयोग कर प्रसव में सहयोग करने से लाभ मिलता है यदि मूत्राशय भरा हुआ है तो उसे कैनुला से खाली कर अवरोध को दूर किया जा सकता है प्रसव के बाद पशु अत्याधिक थक जाता है इस अवस्था में उसे कैल्शियम मेंग्निशियम बोरोग्लूकोनेट तथा डेक्स्ट्रोज देना लाभदायक रहता है।

भ्रूण-प्रसव अवरोध: मादा पशुओं में यह दो प्रकार से होता है:

  • भ्रूण को मादा पशु के जननेन्द्रीय मार्ग के अनुपात से अधिक बड़ा हो जाना।
  • भ्रूण को गर्भाशय में असामान्य स्थिति में पाया जाना ।

कारण: छोटी जाति के मादा पशु को बड़ी जाति के नर पशु से गाभिन करानें से छोटी उम्र में मादा पशु से बच्चे लेने से, कभी-कभी भ्रूण के गर्भाशय मे मर जाने के कारण भ्रूण मादा पशु के जननेन्द्रीय मार्ग से अधिक बड़ा हो जाता है। कभी-कभी जुड़वा बच्चे भी इस अवस्था का कारण बनते हैं।


भ्रूण गर्भाशय मे असामान्य स्थिति मे कुछ प्रमुख कारणों से पाया जाता है: गर्भाशय मे भ्रूण का असामान्य आसन भ्रूण के किसी भी हिलने डुलने या मुड़ने वाले अंग के अपने स्थान से हटने के कारण होती है जैसे सिर का एक तरफ मुड़ जाना, अगले एक अथवा दोनो पैरों का पीछे की तरफ मुड़ जाना, पिछले पैरों का घुटने पर मुड़ जाना, तथा सिर और गर्दन का अगले पैरों के बीच में आ जाना इत्यादि।

भ्रूण की प्रस्तुति: सामान्य रुप में प्रसव के समय भ्रूण का मुख तथा अगली टाॅंगे मांदा पशु के योनि की तरफ रहती है इसे अग्र प्रस्तुति के नाम से जाना जाता है। इस स्थिति में भ्रूण बिना किसी सहयता के बाहर आ जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य स्थितियों में भ्रूण असामान्य स्थिति में योनि के सामने आता है जिसके कारण उसे निकालने के लिए सहायता की आवश्यकता होती है। मादा पशु के शरीर में पायी जाने वाली भ्रूण की असामान्य स्थिति निम्नवत् है:

  • पश्च भ्रूण स्थिति- इस अवस्था में भ्रूण का मुख मादा पशु के मुख की तरफ होता है।
  • खड़ी भ्रूण स्थिति- इस स्थिति में भ्रूण गर्भ की अन्त रेखा पर लम्बवत् स्थित होता है।
  • अनुप्रस्थ पृष्ठ भ्रूण स्थिति- इसमें भ्रूण की पीठ मादा पशु के योनि मुख के सामने होती है।
  • अनुप्रस्थ उदर भ्रूण स्थिति- इस स्थिति में भ्रूण का उदर योनि के सामने होता है।

उपचार: सबसे पहले हाथ को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए इसके बाद हाथ को चिकना कर योनि मार्ग से गर्भाशय में डालकर, भ्रूण की सही स्थिति तथा उसकी प्रस्तुति का अनुमान लगाना चाहिए। भ्रूण के असामान्य स्थिति मे पाये जाने पर मादा पशु को 2 प्रतिशत जाइलोकेन का एपीडुयुरल ऐनेस्थीसिया की सूई लगानी चाहिए। जिससे मादा पशु जोर लगाना बन्द कर देती है। इसके बाद हाथ, रस्सी, तथा हुक की सहायता से भ्रूण को अग्र प्रस्तुति में लाकर बाहर खींचकर निकाला जा सकता हैं। मरे हुए भ्रूण को भ्रूण कटर चाकू द्वारा गर्भाशय में काट-काट कर निकाला जा सकता है। अधिक कठिनाई वाले केसों में जहाॅं पर भ्रूण के बाहरनिकालने के सारे प्रयास विफल हो जाये वहाॅं शल्य चिकित्सा विधि अपना कर भ्रूण को बाहर निकाला जा सकता है।

3. योनि का बाहर आना

मादा पशुओं में गर्भकाल के सातवें से नौवें महीने में प्रायः योनि का कुछ भाग उलटकर बाहर आ जाता है। कभी-कभी मादा पशु के अत्यधिक जोर लगाने के कारण प्रसव के बाद भी यह स्थिति दिखाई पड़ती है।
कारण- इसके प्रमुख कारण निम्न हैं:

  • गर्भकाल में मादा पशु का अत्यधिक दुर्बल होना।
  • मादा पशुओं में कैल्षियम की कमी।
  • उदर का अत्यधिक भरा होना।
  • योनि के लिगामेन्टस के कमजोर हो जाने के कारण तथा।
  • गर्भावस्था में पीछे की ओर अधिक ढालू तथा फर्श का नीचा होना।

अगर यह स्थिति प्रसव के बाद पायी जाती है तो इसका कारण जेर का अधिक देर तक रुकना, योनि मेे प्रसव के समय जख्म का होना तथा गर्भाशय में होने वाला अनियमित संकुचन है।

उपचार: सर्वप्रथम मादा पशु में 2 प्रतिशत जाइलोकेन का ऐपीडयरल ऐनेस्थीसिया का इन्जेक्षन लागाना चाहिए। इसके बाद बाहर निकले हुए भाग को जीवाणुनाषक घोल से साफ कर उस पर एन्टीसेप्टीक लोाशन अथवा मरहम लगाना चाहिए। इसके बाद हाथ से धीरे-धीरे ढकेल कर बन्द मुट्ठी की सहायता से उसे अन्दर बैठा देना चाहिए। प्रभावित मादा पशु को दर्द निवारक तथा एन्टीबायोटिक का पूरा कोर्स देना चाहिए। मादा पशु के अत्याधिक जोर लगाने पर सिक्विील की 3-5 मिलीलीटर मात्रा मांस मे देना लाभदायक होता है। प्रभावित मादा पशु को कैल्सियम बोरोग्लूकोनेट तथा डेक्सट्रोज शिरा में चढ़ाना लाभदायक होता है।

बचाव: प्रसव से पूर्व गर्भावस्था में इसकी रोकथाम की जा सकती है। योनि में किसी प्रकार की चोट अथवा खरोच लगने पर उसे कीटाणुनाशक घोल से साफकर मलहम लगाना चाहिए। पशु के बैठने के स्थान को पीछे की तरफ कुछ ऊॅचा तथा आगे की तरफ कुछ नीचा रखना चाहिए। प्रभावित पशु को थोड़ा-थोड़ा चारा कई बार में खिलाना चाहिए जिससे पशु का पेट गर्भ पर दबाव न डाले।

इस लेख में दी गयी जानकारी लेखक के सर्वोत्तम ज्ञान के अनुसार सही, सटीक तथा सत्य है, परन्तु जानकारीयाँ विधि समय-काल परिस्थिति के अनुसार हर जगह भिन्न हो सकती है, तथा यह समय के साथ-साथ बदलती भी रहती है। यह जानकारी पेशेवर पशुचिकित्सक से रोग का निदान, उपचार, पर्चे, या औपचारिक और व्यक्तिगत सलाह के विकल्प के लिए नहीं है। यदि किसी भी पशु में किसी भी तरह की परेशानी या बीमारी के लक्षण प्रदर्शित हो रहे हों, तो पशु को तुरंत एक पेशेवर पशु चिकित्सक द्वारा देखा जाना चाहिए।

Eclampsia

 What is eclampsia?

Eclampsia is a severe complication of preeclampsia. It’s a rare but serious condition where high blood pressure results in seizures during pregnancy.

Seizures are periods of disturbed brain activity that can cause episodes of staring, decreased alertness, and convulsions (violent shaking). Eclampsia affects about 1 in every 200 women with preeclampsia. You can develop eclampsia even if you don’t have a history of seizures.

What are the symptoms of eclampsia?

Because preeclampsia can lead to eclampsia, you may have symptoms of both conditions. However, some of your symptoms may be due to other conditions, such as kidney disease or diabetes. It’s important to tell your doctor about any conditions you have so they may rule out other possible causes.

The following are common symptoms of preeclampsia:

Patients with eclampsia can have the same symptoms as those noted above, or may even present with no symptoms prior to the onset of eclampsia. The following are common symptoms of eclampsia:

What causes eclampsia?

Eclampsia often follows preeclampsia, which is characterized by high blood pressure occurring in pregnancy and, rarely, postpartum. Other findings may also be present such as protein in the urine. If your preeclampsia worsens and affects your brain, causing seizures, you have developed eclampsia.

Doctors don’t know for sure what causes preeclampsia, but it’s thought to result from abnormal formation and function of the placenta. They can explain how the symptoms of preeclampsia may lead to eclampsia.

High blood pressure

Preeclampsia is when your blood pressure, or the force of blood against the walls of your arteries, becomes high enough to damage your arteries and other blood vessels. Damage to your arteries may restrict blood flow. It can produce swelling in the blood vessels in your brain and to your growing baby. If this abnormal blood flow through vessels interferes with your brain’s ability to function, seizures may occur.

Proteinuria

Preeclampsia commonly affects kidney function. Protein in your urine, also known as proteinuria, is a common sign of the condition. Each time you have a doctor’s appointment, your urine may be tested for protein.

Typically, your kidneys filter waste from your blood and create urine from these wastes. However, the kidneys try to retain nutrients in the blood, such as protein, for redistribution to your body. If the kidneys’ filters, called glomeruli, are damaged, protein can leak through them and excrete into your urine.

Friday, October 8, 2021

रक्त परजीवी रोगों की रोकथाम व उपचार

 संसार में सबसे अधिक पशुयों की संख्या भारत में है। इनका भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है, साथ ही साथ, ये ग्रामीण परिवारों की रोज़ी-रोटी का साधन भी हैं। यहाँ की जलवायु गर्म तथा नम होने के कारण यहाँ पशुयों में विभिन्न परजीवियों से होने वाली बीमारियां भी अधिक होती हैं। ये परजीवी बाह्य व आंतरिक, दोनों प्रकार के होते हैं। आंतरिक परजीवियों में बहुत से पशुयों के ख़ून में पाये जाते हैं जिन्हें रक्त परजीवी कहते हैं। इन रक्त परजीवियों को फैलाने वाले अधिकतर बाह्य परजीवी जैसे मच्छर, मक्खी, किलनी (चिचड़) तथा दूसरे कीट भी होते हैं।

रक्त परजीवी पशुयों को शारीरिक रूप से कमजोर करके उनकी उत्पादन तथा कार्यक्षमता को कम कर देते हैं।   यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो पशुयों की मृत्यु भी हो जाती है। कुछ रक्त परजीवी तो बहुत ही घातक होते है, जिनके संक्रमण से पशुयों की मृत्युदर बहुत होती है। पशुपालक इन रोगों की उचित जानकारी के अभाव में भ्रांतियों वश तथा नीम-हकीम और झोलाछाप डाक्टरों के प्रभाव में आकर अपने पशुधन का बहुत नुकसान कर लेते हैं।  पशुयों से अधिक कार्य एवं उत्पादन प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि पशुपालक ऐसी बीमारियों के फैलने के कारण तथा रोकथाम के बारे में जागरूक हों, जिससे वह समय पर उचित रोकथाम व उपचार करा सकें।



थिलेरिओसिस (थिलेरिया रोग)

यह रोग विदेशी एवं संकर नस्ल के गोवंशीय पशुयों में अधिक पाया जाता है। कम उम्र के पशु तथा लंबी यात्रा के बाद थके हुये पशुयों में इस रोग की अधिक संभावना रहती है। यह रोग थिलेरिया एनुलेटा नामक रक्त परजीवी से होता है, जो एक विशेष प्रकार की किलनी (चिचड़), हायलोमा एनाटोलिकम के काटने से फैलता है। यह परजीवी लाल एवं एक विशेष प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकायों में पाया जाता है।   इस रोग में पशु को तेज़ ज्वर (104-106फा.) हो जाता है। आँखों में सूजन तथा नाक से स्त्राव आता है। पशु की तेज़ श्वास चलती है तथा लसिका ग्रंथियों में सूजन आ जाती है।   इसमें पशु के फेंफड़े बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तथा मूत्र का रंग पीला हो जाता है। पशु में ख़ून की कमी हो जाती है। इलाज के अभाव में 70% तक पशुयों की मृत्यु 2-3 सप्ताह में हो जाती है। रोगी पशु के शरीर में इस रोग के परजीवियों की कुछ संख्या तो बनी रहती है, जो किलनियों (चिचड़ों) द्वारा स्वस्थ पशु तक पहुँच जाती है। इस रोग के उपचार तथा बचाव के लिए अब अपने देश में इसकी दवा तथा टीका उपलब्ध हैं। किन्तु उपचार मंहगा पड़ता है, अत: रोग न हो इसके लिए पशुयों का किलनियों (चिचड़ों) से बचाव करना चाहिए।

थिलेरिओसिस से गोवंशीय पशुयों का बचाव, टीका तथा निश्चित अंतराल पर किलनी नाशक दवायों के उपयोग से किया जा सकता है।   इसके अतिरिक्त नए पशुयों को प्रवेश के समय लगभग 40 दिन तक अलग रखकर तथा उपचार द्वारा इनकी रोकथाम की जा सकती है।   यह बिलकुल वैसा ही है जैसा कोविड-19 की वैश्विक महामारी में इन्सानों को अलग रखकर किया जा रहा है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि संवेदनशील पशु में इस रोग की केवल एक किलनी, रोग के परजीवियों को संचरित कर उस पशु को रोग ग्रसित कर सकती है। थिलेरिया एनुलेटा से होने वाले थिलेरिओसिस के लिए एटीनुएटेड टिशू कल्चर टीका रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए बाज़ार में उपलब्ध है। इस टीके को हमेशा अतिहिमीकृत स्थिति में रखा जाता है। भारतीय बाज़ार में इस समय केवल बुपार्वाक्युओन (ब्यूटालैक्स) नामक दवा इस रोग के उपचार के लिए उपलब्ध है।   यह 2.5 मि.ग्रा. प्रति किलोग्राम शरीर के वज़न के हिसाब से मांसपेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है। गंभीर मामलों में 48 घंटे के अंतराल पर दूसरा इंजेक्शन दिया जाता है, अन्यथा केवल एक ही इंजेक्शन इसके उपचार के लिए उपयुक्त है।

बबेसिओसिस (लाल मूत्र या खूनी मूत्र का ज्वर)

यह रोग लगभग सभी पालतू पशुयों में विभिन्न प्रजाति के बबेसिया नामक सूक्ष्म रक्त परजीवियों से होता है, जोकि लाल रक्त कणिकायों के अंदर पाये जाते हैं तथा किलनियों (चिचड़ों) के काटने से रोगी से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यह रोग तीव्र एवं चिरकालिक दोनों अवस्थायों में हो सकता है। इस रोग में पशु को तेज़ ज्वर आता है। पशु चारा नहीं खाता है व मूत्र का रंग लाल हो जाता है।   इसलिए इस बीमारी को खूनी या लाल मूत्र का बुखार कहते हैं। पशु की सांस व धड़कन तेज़ हो जाती हैं।   लगातार लाल रक्त कणों के नष्ट होने से रक्त की कमी हो जाती है तथा पशु को पीलिया एवं रक्त अल्पता रोग भी हो जाता है। इस रोग में पशु की तिल्ली बढ़ जाती है। तीव्र अवस्था में उचित इलाज के अभाव में 90% पशुयों की मृत्यु हो जाती है। कम उम्र के पशुयों में यह रोग कम होता है तथा यदि हो भी जाए तो तीव्र नहीं होता और अधिकतर ठीक भी हो जाता है।   यह रोग किलनियों (चिचडों) से फैलता है। अत: पशुयों को किलनियों से मुक्त रखने के उपाय करने चाहिएँ।

बबेसिओसिस से रोकथाम टीकाकरण, किलनियों (चिचड़ों) से बचाव, क्वारनटाईन (संगरोध) एवं दवाइयों से उपचार द्वारा की जा सकती है।   विदेशों में कुत्तों में बबेसिया कैनिस से होने वाली बबेसिओसिस के लिए पाइरोडोक नामक टीका उपलब्ध है। लाक्षिक रोग ग्रस्त पशु इस रोग के परजीवी के लिए वाहक बने रहते हैं, और यदि ऐसे क्षेत्र में जाते हैं जो रोगमुक्त है तथा वहाँ के पशु भी रोगमुक्त हैं, तो वाहक पशु वहाँ पर इस रोग को फैला सकते हैं।   अत: रोगमुक्त क्षेत्र में वाहक पशु को भी उपचार द्वारा परजीवी रहित कर देना चाहिए। बबेसिओसिस में दवा का प्रभाव रोग की तीव्रता, दवा की मात्रा, उपचार  के समय और दवा के परजीवी के साथ संपर्क समय पर निर्भर करता है। पशु को संक्रमण विहीन करना इस परजीवी की छोटी प्रकार की प्रजातियों में प्राय: कठिन होता है। संभवत: यह छोटी प्रजाति के परजीवियों के शिरायों और धमनियों की दीवार से चिपक जाने के कारण होता है।   यह छोटी प्रजातियों के परजीवी रक्त प्रवाह को पतली शिरायों और धमनियों में रोक सकते हैं।

वर्तमान में भारतीय बाज़ार में केवल बेरेनिल नामक दवा बबेसिओसिस के उपचार के लिए उपलब्ध है, जो 3-5 मि.ग्रा. प्रति कि.ग्रा. शारीरिक वज़न के हिसाब से मांस पेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है।  यह बड़ी प्रजाति के बबेसिया में बहुत प्रभावी है। कुत्तों में यह दवा बहुत ही सावधानी के साथ देनी चाहिए क्योंकि इसके कुत्तों में हानिकारक प्रभाव देखे गए हैं। दूसरी दवाएं इमिडोकार्ब, इमीकारबैलाइड, क्वीनोरियम सल्फेट तथा पेटामिडीन हैं, जो देश में उपलब्ध नहीं हैं।

ट्रिपैनोसोमिओसिस (सर्रा रोग)

यह पशुयों में होने वाली एक घातक बीमारी है, जोकि ट्रिपैनोसोमा इवैनसाई नामक सूक्ष्म रक्त परजीवी से होती है। यह सूक्ष्म परजीवी बाह्य कोशकीय है।   यह बीमारी टेबेनस नामक मक्खी फैलाती है, जिसे आम भाषा में ‘डांस’ कहते हैं। जब यह मक्खी संक्रमित पशु का रक्त चूस कर दूसरे स्वस्थ पशु को काटती है तो इस रोग के परजीवी स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और बार-बार विभाजन के बाद परजीवी की रक्त में संख्या बढ़ जाती है तथा स्वस्थ पशु भी कुछ दिनों बाद रोगग्रस्त हो जाता है।   मुख्य रूप से इस रोग से ग्रसित होने वाले पशु जैसे घोड़ा, खच्चर, ऊंट, कुत्ता, गोवंशीय पशु तथा भैंस हैं। कभी-कभी यह रोग संक्रमित सुई से भी फ़ैल सकता है।   पशुयों में लक्षण उनकी प्रजाति तथा परजीवियों के विभेद पर निर्भर करते हैं। घोड़ों में प्रारम्भ में लगातार तेज़ बुखार आता है जो बाद में रुक-रुक कर आने लगता है। पशु चारा तो खाता रहता है लेकिन कमजोर होता चला जाता है।  शरीर में खून की कमी हो जाती है और शरीर के निचले भाग जैसे पैर, धड़ तथा उदर में सूजन आ जाती है। जानवर सुस्त हो जाता है तथा लड़खड़ा कर चलता है। इस बीमारी में पशु की कुछ दिन से कुछ महीनों में मृत्यु हो जाती है।

कुत्तों में इस रोग के लक्षणों में तेज़ बुखार, आँखों की पुतलियों में सफेदी, अंधापन तथा पागलपन हैं। ऊंटों में सर्रा की बीमारी बहुत लंबे समय तक चल सकती है। कभी-कभी तो तीन वर्ष तक भी पशु बीमार रह सकता है। इसलिए ऊंटों में इस बीमारी को त्रिवर्षा रोग भी कहते हैं।

भैंसों तथा गोवंशीय पशुयों में इस रोग के लक्षण अन्य पशुयों से भिन्न हो सकते हैं तथा इनमें यह रोग अतितीव्र, तीव्र व दीर्घकालिक रूप में हो सकता है।अतितीव्र रूप की अवस्था में एकाएक तेज़ बुखार, पशु का उत्तेजित होना, अंधे की तरह दीवार से टकराना, सिर को ज़मीन या दीवार से मारना, कंपकपी आना, शरीर का थर्रथराना, गिर कर छटपटाना, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मूत्र त्याग करना आदि लक्षण दिखाई देते हैं।   इस स्थिति में पशु के उपचार में देरी होने पर उसकी मृत्यु हो जाती है। दीर्घकालिक रूप में पशु को तेज़ बुखार नहीं रहता है, कम खाता है तथा लगातार कमजोर होता जाता है। पशु इतना कमजोर हो जाता है कि वह उठ नहीं पाता तथा बैठा रहता है।

इस रोग का उचित निदान होने पर सर्रा की दवाई का उपयोग पशु चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए। इसके लिए खून की स्लाइड बनाकर रोग की जांच कराई जा सकती है।   इस रोग से बचाव के लिए आवश्यक है, कि पशुयों में इस रोग को फैलाने वाली मक्खी ‘डांस’ से पशुयों को काटने से बचाया जाए तथा संक्रमित सुई का उपयोग न किया जाये।

इस रोग से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए वर्तमान में केवल रासायनिक दवायों के प्रयोग से उपचार व बचाव संभव है, लेकिन इसकी भी कुछ सीमाएं हैं जैसे : –

  1. इसके उपचार एवं बचाव के लिए सीमित दवाएं ही उपलब्ध हैं।
  2. दवायों के प्रति ट्रिपाइनोसोमा में प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो सकती है।
  3. वर्तमान में प्रचलित कुछ दवायों के हानिकारक प्रभाव हैं।

इसलिए वर्तमान में जो कुछ दवाएं उपलब्ध हैं उन्हें सावधानीपूर्वक उचित मात्रा में इस रोग के निश्चयात्मक निदान हो जाने पर ही प्रयोग करें जिससे परजीवी में प्रतिरोधी क्षमता विकसित न हो और न ही इन दवाइयों का कोई हानिकारक प्रभाव पड़े। उपचार के लिए काम आने वाली दवाइयों की तुलना में जो दवाइयाँ बचाव के लिए उपयोग में आती हैं, उनमें प्रतिरोधी क्षमता पैदा होने की अधिक संभावना रहती है क्योंकि उपचार में आने वाली दवा शीघ्र ही शरीर से निकल जाती है। जबकि बचाव के काम आने वाली दवा अधिक समय तक कम मात्रा में शरीर में बनी रहती है। उपचार के काम आने वाली दवा को भी यदि कम मात्रा में बार-बार रोग व्याप्त क्षेत्र में उपयोग किया जाता है तो भी प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो सकती है। यदि एक दवा के प्रति यह रोग रोधी क्षमता विकसित हो गई है तो उससे मिलती-जुलती दूसरी दवा हेतु भी यह क्षमता विकसित हो सकती है। वर्तमान में उपयोग में आने वाली कुछ दवाइयाँ इस प्रकार हैं:

  1. एंट्रीसाइड मिथाइल सल्फेट (क्विनपाइरामिन मिथाइल सल्फेट): मात्रा 3.5 मि.ग्रा. प्रति किग्रा शारीरिक भार की दर से अधोत्वचीय माध्यम से इंजेक्शन द्वारा दी जाती है। यह सर्रा के लिए प्रभावकारी और सुरक्षित है तथा सुरामिन के विरुद्ध प्रतिरोधी क्षमता वाले ट्रिपाइनोसोमा पर भी प्रभावी है।
  2. एंट्रीसाइड प्रोसाल्ट (क्विनपाइरामिन मिथाइल सल्फेट तथा क्विनपाइरामिन क्लोराइड) 7.4 मि.ग्रा. प्रति किग्रा 1.5:1 के अनुपात में मिलाकर शारीरिक भार की दर से अधोत्वचीय माध्यम से इंजेक्शन द्वारा दी जाती है।  इस मिश्रण में क्लोराइड वाला भाग शरीर के अधोत्वचीय हिस्से में भंडारित हो जाता है और वहाँ से धीरे-धीरे शरीर में उपलब्ध होता रहता है जो लंबे समय तक रोग के परजीवियों को प्रवेश करते ही मारती रहती है।   यह बचाव लगभग 3 महीने तक रहता है।
  3. डिमिनाज़िन एसीट्यूरेट (बेरेनिल): 3.5 मि.ग्रा. प्रति किग्रा शारीरिक भार की दर से मांसपेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है।  ट्रिपैनोसोमिएसिस के अतिरिक्त यह दवा बबेसीओसिस में भी प्रभावकारी है। यह दवा शरीर से शीघ्र ही निकल जाती है।   अत: प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम विकसित होती है। दवा की अधिक मात्रा देने पर हानिकारक प्रभाव भी होते हैं।   ऊंटों और कुत्तों में इस दवा को बहुत ही सावधानी के साथ एक पशु चिकित्सक की उपस्थिति में उपयोग करना चाहिए। इसके साथ कुछ जीवन रक्षक अन्य उपयोगी दवाएं भी रखनी चाहिएँ।
  4. सुरामिन: ऊंटों में यह दवा सबसे प्रभावी दवा है तथा शिरों में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है तथा यह 10 मि.ग्रा. प्रति किग्रा शारीरिक भार के हिसाब से दी जाती है लेकिन भारतीय बाज़ार में यह दवा अब उपलब्ध नहीं है।
  5. आइसोमेटामीडियम क्लोराइड (सैमोरिन): 0.25-0.5 मि.ग्रा. प्रति किग्रा. शारीरिक भार के हिसाब से मांस पेशी में इंजेक्शन दिया जाता है। यह दवा सर्रा में उतनी प्रभावी नहीं हैं जितनी कि ट्रिपैनोसोमा की अन्य प्रजातियों में प्रभावी है।

एनाप्लाज़्मोसिस

भारत में यह बीमारी पशुयों में एनाप्लाज्मा मार्जिनेल  नामक सूक्ष्म रक्त परजीवी से होती है। यह रोग भी किलनियों (चिचड़ों) द्वारा फैलता है। इस रोग के परजीवी भी लाल रक्त कणिकायों में पाये जाते हैं।   पशु को इस रोग में तेज़ बुखार आता है। लाल रक्त कणिकायों के नष्ट हो जाने के कारण रक्त की कमी व पीलिया रोग हो जाता है। यह रोग भी विदेशी व संकर नस्ल के पशुयों में अधिक तीव्र होता है। इस रोग में दुधारू पशुयों में अचानक दूध की कमी हो जाती है। गाभिन पशुयों में गर्भपात भी हो सकता है। कम उम्र के पशुयों में यह रोग साधारण प्रकार का होता है तथा अधिक उम्र के पशुयों में रोग अधिक तीव्र होता है जिससे पशु की मृत्यु भी हो जाती है।

सूक्ष्म रक्त परजीवी रोगों की जांच (निदान)

पशु मालिक ऊपर बताए गए लक्षणों के आधार पर मोटे तौर पर रोग का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन उचित निदान व उपचार तो पशु चिकित्सक से ही करवाना चाहिए। निदान के लिए रोगी पशु की रक्त की स्लाइड बनाकर प्रयोगशाला में भिजवाई जा सकती है, जहां सूक्ष्मदर्शी द्वारा इन रोगों की जांच की जाती है। इसके अलावा अन्य विधियों से भी इन रोगों की जांच की जा सकती है।

सूक्ष्म रक्त परजीवी से बचाव

सर्रा रोग को छोड़कर शेष तीनों उपर्युक्त बीमारियाँ किलनियों (चिचड़ों) से फैलने वाली हैं। अत: किलनियों से बचाव करके पशुयों को इन रोगों से बचाया जा सकता है।   बाज़ार में अनेक कीटनाशक दवाएं उपलब्ध हैं, जिन्हें दवा निर्माता या पशु चिकित्सक की सलाह पर पशुयों को लगायें।   यदि इन कीटनाशक दवायों के उपयोग करने पर कोई हानिकारक प्रभाव दिखाई देता है तो तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें।   जिस स्थान पर पशु बांधे जाते हैं, उस स्थान को भी किलनियों (चिचड़ों) से मुक्त रखना आवश्यक है। इसके लिए उस स्थान पर भी कीटनाशक दवायों का छिड़काव करना चाहिए।   दरारों और छिद्रों को भी बंद कर दें क्योंकि इसमें किलनियाँ (चिचड़) छिप जाती हैं जहां दो साल तक भी ज़िंदा रह सकती हैं। विदेशी नस्ल या संकर नस्ल का पशु या फिर ऐसा पशु जो लंबी यात्रा के बाद थका हो, तुरंत ही ऐसे स्थान पर नहीं रखना चाहिए जब तक कि वह स्थान पूरी तरह से किलनियों से मुक्त न हो गया हो अन्यथा इन रोगों से संक्रमित एक-दो किलनी ही संवेदनशील पशुयों में रोग फैलाने के लिए पर्याप्त होती है।

बाह्य परजीवियों की रोकथाम और बचाव के लिए पिछले 30-40 वर्षों में अनेक कीट और किलनी नाशकों का उपयोग होता रहा है। इनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने तथा अवशेषी प्रभाव के कारण इनमें से अनेकों का उपयोग बंद हो गया है। अब कईसंश्लेषित पाइरेथ्रोआड्स का कीटनाशकों के रूप में उपयोग हो रहा है क्योंकि यह दूसरे कीटनाशकों की तुलना में अधिक सुरक्षित और प्रभावकारी हैं, जैसे फ्लुमैथ्रिन, साइपरमैथ्रिन और साइप्रोथिन।   यह क्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्बन, औरगैनोफ़ास्फेट और एमाइड्स प्रतिरोधी क्षमता वाले कीटों पर भी प्रभावी हैं।

कीटनाशक दवायों का उपयोग

  1. मैलाथियोन 0.02 % घोल से पशु को नहलाएँ।
  2. एसुनटोल 0.02%, एक भाग तथा 10 भाग खड़िया मिलाकर लगाएँ।
  3. आइवरमैक्टिन इंजेक्शन भी बाज़ार में उपलब्ध है जिसे पशु चिकित्सक से लगवाएँ।
  4. डेल्टामैथ्रिन (16.5%) 2 मि.ली. को एक लीटर पानी में मिलाकर सप्ताह में एक बार पशु को नहलाएँ।

The content of the articles are accurate and true to the best of the author’s knowledge. It is not meant to substitute for diagnosis, prognosis, treatment, prescription, or formal and individualized advice from a veterinary medical professional. Animals exhibiting signs and symptoms of distress should be seen by a veterinarian immediately.

Followers